• जानिये फांसी देने के पूर्व कैदी के कान में जल्लाद क्या कहता है... ईनाम...

    नमस्कार दोस्तो आज हम आपको ले जायेंगे एक ऐसे रहस्य की ओर जिसको आप भी जानना चाहेंगे, दोंस्तो अक्सर आपने फिल्मो मे देखा होगा या कहीं से सुना होगा की किसी अपराधी को फंासी पर चढाने के पूर्व जल्लाद कैदी के कानो मे कुछ कहता है। तो दोस्तो आज हम आपको इस रहस्य से वाकिफ कराना चाहेंगे । नको ईनाम भी दिया जाता है।

  • माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स

    दोस्तो आज हम बात करेंगे माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स के बारे में। दोस्तो माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स लडकियाॅ थी।

  • जानिए दुनिया में जन्म लेने वाला पहेला इंसान कौन था...

    नमस्कार दोस्तो, हर कोई जानना चाहता है की दुनिया में जन्म लेने वाला पहेला इंसान तो आइये आज हम जानते है हमारे अस्तित्व के बारे मे, आइये जानते है हमारे इतिहास को । इसके अलावा आज हम आपको बतायेंगे उस महिला के बारे मे जिसने दुनिया पर पहली बार बच्चा पैदा किया।

पाकिस्तानी सेना में मेजर बना था भारत का ये असली 'जासूस'

दोस्तों जब देशभक्ति की बात आती है तो हर व्यक्ति ओज और जोश से भर जाता है। दोस्तों आज 26 जनवरी है, हमारे देश के बहुत वीर हमारे देश  आज़ादी के लिए अपनी जान की क़ुरबांनी दिए थे और आजादी के बाद आज भी हमारे वीर जवान देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते है। दोस्तों, आज हम आपको बताएंगे एक ऐसे देश भक्त जासूस के बारे में जिसके बारे में आपने शायद ही सुना होगा। दोस्तों हम बात कर रहे हैं रियल हीरो रविंद्र कौशिक के बारे में जिसने अपने देश के लिए सब कुछ त्याग कर अकेले पाकिस्तान चला गया जासूसी करने के लिए। आइए जानते हैं इस रियल हीरो की कुछ सुनी - अनसुनी रोचक रहस्यमयी बातें।

      श्रीगंगानगर में हिंदू पंडित के घर पैदा हुआ रविंद्र कौशिक नाटक (अभिनय) करने का बहुत शौकीन था।
रविंद्र कौशिक को रूप बदलकर बहरूपिया बनने में महारथ हासिल थी। रुप बदलने की इसकी कला अद्भुत थी इसकी इस कला को भेद पाना बेहद ही मुश्किल था।

     रविंद्र को अभिनय करने के लिए लखनऊ बुलाया गया था वहां वह देश प्रेम का अभिनय करते हुए चीन में पकड़े गए भारतीय सैनिकों की दर्द भरी दास्तां का सटीक अभिनय कर रहे थे। रविंद्र का दर्द भरा अभिनय लोगों को बिल्कुल सच लग रहा था। इन्हीं लोगों की भीड़ में RAW का एक अधिकारी भी बैठा था जो कि रविंद्र की अभिनय से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ और रविंद्र को अपने लिए काम करने को कहा और रविंद्र ने इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया। रविंद्र को बहरूपिया बनकर मुसलमान की एक्टिंग करने को कहा गया था।

     रविंद्र को एक गुप्त स्थान पर ले जाया गया और वहां उसकी 2 साल तक ट्रेनिंग चली इस दौरान रविंद्र में यह भी देखा गया कि उनमें देश प्रेम और धर्म के प्रति कितनी आस्था है। यह इसलिए आवश्यक था ताकि अगर कोई एजेंट मुस्लिम देश में पकड़ा भी गया तो वह किस हद तक मुंह खोल सकता है लेकिन रविंद्र RAW अधिकारियों की सभी परीक्षा में पास हुआ।

     आखिर वह दिन आ गया जब रविंद्र को जासूसी के लिए पाकिस्तान जाना था। RAW के अधिकारियों ने रविंद्र को जासूस बनकर पाकिस्तान जाने को कहा और यह भी कहा गया कि अगर तुम वहां किसी कारणवश मर भी गए तो यह तुम्हारी जिम्मेदारी होगी और अगर पकड़े गए तो हम तुम्हें नहीं पहचानेंगे। रविंद्र ने अधिकारियों की बात पर हामी भरते हुए कहा मुझे खुद पर पूर्ण विश्वास है कोई भी मेरे रूप बदलने की कला को नहीं पहचान पाएगा। यह सब सुनकर RAW के सभी अधिकारी खुश हो गए।

     रविंद्र को मुसलमान के रूप में ढालने के लिए उसका खतना कराया गया, दिन में पांच बार नमाज पढ़ने की ट्रेनिंग दी गई, उर्दू भाषा सिखायी गयी और कुछ दिन मुसलमानों की संगति में रखा गया‌

      रविंद्र ने अपने घर में यह बताते हुए विदा ले लिया कि उसकी दुबई में नौकरी लग गई है और अब वह वही रहेगा और घर में पैसे भेज दिया करेगा।

      भारतीय सीमा पार कराकर रविंद्र को पाकिस्तान भेज दिया गया जहां सबसे पहले वह अपना शिनाख्ती कार्ड बनाया और कराची के एक महाविद्यालय में एलएलबी की उपाधि प्राप्त कर ली। रविंद्र कौशिक पाकिस्तान में नबी अहमद शाकिर के नाम से जाना गया। रविंद्र कौशिक उर्फ़ नबी अहमद शाकिर पाकिस्तानी सेना में भर्ती हो गया। कहा जाता है कि रविंद्र कौशिक पाकिस्तानी सेना में मेजर के पद तक पहुंच गए थे। किसी को कोई शक ना हो इसलिए रविंद्र ने अपने सीनियर अधिकारी की बेटी फातिमा से शादी कर ली। और पाकिस्तान में ही एक मुसलमानी लड़की के साथ अपना घर बसा लिया।

      रविंद्र कौशिक उर्फ़ नबी अहमद शाकिर पाकिस्तान की बहुत सारी खुफिया जानकारी RAW को भेजता गया और सन् 1971 के युद्ध जीतने में भी भारत के लिए अहम योगदान दिया। सब कुछ सही तरीके से चल रहा था फिर कांग्रेस की सरकार ने यह सोचा कि रविंद्र की सहायता के लिए एक और जासूस पाकिस्तान भेजना चाहिए। रविंद्र ने इसके लिए साफ साफ मना कर दिया। परंतु सरकार के दबाव के चलते रविंद्र ने मजबूरी में एक और सहयोगी के लिए हामी भर दी। फिर एक और RAW एजेंट को रविंद्र के सहयोग के लिए पाकिस्तान भेजा गया जो कि कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी गलती साबित हुई। यह नया जासूस भारत की सीमा पार कर पाकिस्तान के एक होटल में चाय पीने रुक गया। वहीं पर कुछ पाकिस्तानी सैनिक भी बैठे थे। उन सैनिकों को इस  जासूस पर शक हो गया और वह जासूस पकड़ा गया। वह जासूस डर कर पाकिस्तानी सैनिको को सब कुछ सच - सच बता दिया। उसने कहा "मैं भारत से आया हूं अपने दोस्त से मिलने"। इस तरह नए जासूस ने RAW एजेंट के बारे में सभी पोल खोल दी और रविंद्र कौशिक पकड़ा गया। इस नए जासूस की मूर्खता के कारण रविंद्र पकड़ा गया और रविंद्र को जेल में डाल दिया गया। रविंद्र कौशिक पर अनेक प्रकार के जुर्म किए गए। रविंद्र को फांसी की सजा सुनाई गई परंतु वहां की मानवाधिकार संस्थाओं ने इस फांसी को उम्रकैद में तब्दील करवा दी।

     सजा के पहले रविंद्र को 12 दिन तक गुप्त बंद कमरे में बिना भोजन दिए रखा गया था। उसे सिर्फ पानी ही दिया जाता था वह भी सिर्फ उतना ही पानी जिससे कि वह जिंदा रह सके। 12 दिन तक इस हालत में रहने से रविंद्र को हृदय की बीमारी हो गई थी जिसका पाकिस्तान की जेल ने इलाज भी नहीं करवाया। इस बीच रविंद्र ने अपने घर में खत लिखकर सब कुछ सच बता दिया। खत में रविंद्र ने इच्छा जाहिर की थी कि वह भारत की भूमि पर मरना चाहता है। घरवालों ने नेताओं से मिलकर रविंद्र को छुड़ाने की कोशिश की परंतु नेताओं ने साफ साफ मना कर दिया और कहा कि हम कोई मदद नहीं कर सकते हमने पहले ही एग्रीमेंट पर साइन किया है कि पकड़े जाने पर हम कोई सहायता नहीं करेंगे।

     अंत में सन् 2001 में रविंद्र कौशिक ने पाकिस्तान की जेल में अपना प्राण त्याग दिया। भारत सरकार ने रविंद्र का शव लेने से भी इंकार कर दिया और रविंद्र की शव को पाकिस्तान ने कचरे के ढेर के साथ जला दिया।

     रविंद्र कौशिक को "ब्लैक टाइगर" की उपाधि से नवाजा गया था। दोस्तों यह थी रियल हीरो रविंद्र कौशिक की रोचक बातें। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही चटपटी रहस्यमयी और मजेदार आर्टिकल्स के लिए......


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दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान सहारा नहीं, ये है...


हम सब यही मानते हैं कि अफ्रीका महाद्वीप का सहारा रेगिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। परंतु दोस्तों अंटार्कटिक दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान है जो कि चारों ओर से पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ बर्फ से ढका हुआ है। इस जगह को दुनिया का आखिरी कोना भी कहा जाता है। इस जगह पर  बहुत कम बारिश होती है इस वजह से इसे ठंडा रेगिस्तान भी कहा जाता है। हाल ही में इस महाद्वीप के बारे में कुछ अजीबो-गरीब रहस्यो के बारे में पता चला है जिसके बारे में हम आपको आगे बताएंगे।


     अंटार्कटिका में बहुत ज्यादा ठंड होने के कारण कोई भी इंसान यहां स्थायी रूप से नहीं रह सकता। हालांकि यहां पर कुछ देशों के रिसर्च स्टेशन है जहां लोग खोज के लिए आते जाते रहते हैं। पृथ्वी का सबसे शुष्क स्थान भी इसी अंटार्कटिका महाद्वीप में स्थित है जिसे ड्राइ वैली के नाम से जाना जाता है। अंटार्कटिका में सन् 1962 से एक  न्यूक्लियर पावर स्टेशन भी है। अंटार्कटिका में एक फायर स्टेशन भी है, आपको बता दें कि अंटार्कटिका में आग लगने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अंटार्कटिका का 99% हिस्सा बर्फ से ढका हुआ है।

     कहा जाता है कि करीब 53 लाख साल पहले अंटार्कटिका बहुत गर्म स्थान हुआ करता था और इसके किनारों पर खजूर का पेड़ आसानी से देखा जा सकता था। उस समय तापमान लगभग 20°C से ज्यादा ही होता था। सन् 1820 में अंटार्कटिका को सबसे पहली बार देखा गया। अंटार्कटिका पर कोई भी अपना अधिकार नहीं जमा सकता। सन् 1959 में 12 देशों ने एक संधि के तहत इस जगह को शांतिपूर्ण अनुसंधान कार्य के लिए चुना।

     पूरी धरती में मौजूद पानी का लगभग 70% हिस्सा अंटार्कटिका में ही पाया जाता है। अंटार्कटिका महाद्वीप के नीचे लगभग 300 से भी ज्यादा ठंडे पानी की झीले पायी जाती है। अंटार्कटिका में एक सक्रिय ज्वालामुखी भी है। धरती का अब तक का सबसे न्यूनतम तापमान -88.3 सेल्सियस इसी जगह पर मापा गया है। यहां पर 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी तेज हवाएं चलती है जो कि बर्फ की एक बड़ी एवं मोटी हिस्से को भी उड़ा ले जाती है।

अंटार्कटिका का सबसे बड़ा रहस्य :-
            अंटार्कटिका के लिविंगस्टन नामक द्वीप में सन् 1918 में रिसर्चर्स को एक महिला की खोपड़ी और पैर की एक हड्डी मिली जो कि 175 साल पुरानी थी। रिसर्च में यह बताया गया कि यह खोपड़ी और हड्डी किसी 21 वर्षीय चीली महिला की है जिसकी मृत्यु सन् 1819 से 1825 के बीच में हुई थी। कहा जाता है कि अंटार्कटिका में पाया गया यह अब तक का सबसे पुराना इंसानी अवशेष है। सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जिस जगह पर इस महिला का अवशेष पाया गया है उस जगह से चीली करीब 1000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है। अब सवाल यह बनता है कि आखिर वह महिला उस जगह पर कैसे पहुंची जबकि उस समय वहां पर नाव एवं डोंगियो के सहारे भी जाना असंभव था, यह आज तक रहस्य ही बना हुआ है।

     अंटार्कटिका के बर्फ के 3.5 किलोमीटर नीचे झील भी मौजूद है। अंटार्कटिका के बर्फ के 1 किलोमीटर नीचे वैज्ञानिकों को सूक्ष्मजीव भी मिले हैं। इन सुक्ष्मजीवो में कुछ विशेष प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र भी मिले हैं जो धरती पर अन्य जगहों में नहीं पाए जाते हैं। अजीब बात यह है कि इन जीवो को न तो सूर्य प्रकाश मिल रही है और ना ही ताजी हवा मिलती है फिर भी ये सुक्ष्मजीव लंबे समय से जीवित रह रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन सूक्ष्मजीवो का विकास मीथेन एवं अमोनिया की वजह से हो रहा है।

    अंटार्कटिका में इंसानों का रहना लगभग असंभव था ऐसी विषम परिस्थिति वाली अंटार्कटिका में भी क्रूर तानाशाह शासक हिटलर का नाजी बेस मौजूद है। द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरुआती समय में हिटलर ने कुछ गुप्त मिशन के तहत सैनिकों को रवाना कर दिया। हालांकि यह गुप्त मिशन कुछ महीनों तक ही चला और 5 फरवरी सन् 1939 को नाजी सेना अंटार्कटिका से वापस आ गयी।

     अंटार्कटिका में कुछ ऐसी बर्फ सीड्स की खोज की गई है जिनसे जब हवा टकराती है तो किसी महिला के रोने की आवाज सुनाई देती है। हालांकि इस आवाज को हम मनुष्य सुन या महसूस नहीं कर सकते परंतु कुछ विशेष मशीनों की मदद से इस आवाज को आसानी से सुना जा सकता है।
      
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जमीन को हम कितनी गहराई तक खोद सकते है..?

    जैसा कि दोस्तों हम सभी जानते हैं यह पृथ्वी गोल है। इस हिसाब से एक प्रश्न यह उठता है कि अगर हम भारत के किसी एक भाग पर खुदाई करे तो क्या हम किसी दूसरे भू-भाग पर या देश अमेरिका तक पहुंच सकते हैं। जैसा कि हम जानते हैं भारत के ठीक पीछे अमेरिका आता है तो क्या हम भारत से सुरंग बनाकर अमेरिका जा सकते है क्या..? दोस्तों यह सवाल थोड़ा अजीब है परंतु इस सवाल में दम तो है, तो आइये अब जानते है की जमीन को हम कितनी गहराई तक खोद सकते है..?



      बचपन में हमने पढ़ा था कि यह धरती अलग-अलग परतों से बनी हुई है परंतु हैरान कर देने वाली बात यह है कि वैज्ञानिक भी आज तक यह पता नहीं लगा पाए कि आखिर इन परतों के नीचे क्या है? वैज्ञानिकों का सिर्फ अनुमान है कि इन परतों के नीचे खनिज या कुछ ऐसी जरूरी पदार्थ हो सकते हैं जो कि किमती और हमारे लिए उपयोगी है। परंतु यह सिर्फ एक अनुमान है सच क्या है यह किसी को नहीं पता। धरती के अंदर तक जाने के लिए विभिन्न देशों ने बहुत प्रयास किए परंतु हर बार असफलता ही हाथ लगी। दोस्तों आज हम आपको बताएंगे एक ऐसी जगह के बारे में जो कि मनुष्यो द्वारा धरती पर खोदी गई सबसे अधिक गहरी जगह है। इस जगह की गहराई में छुपी है अनेकों रहस्य जो कि आपको निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर देंगे।

     सोवियत यूनियन ने रूस में एक खुदाई की जो कि धरती की सबसे गहरी जगह है जिसमे 167 क़ुतुब मीनार समा जाये अब आपको आश्वर्य यह होगा की फिर कितनी होगी इस जगह की गहराई ? तो अब हम आपको बता दे की वो जगह की गहराई 12 किलोमीटर है। 12 किलोमीटर गहरी इस जगह का नाम "कोला सुपरडीप होल" रखा गया है। यह कोला सुपरडीप होल समुद्र की सबसे अधिकतम गहराई से भी ज्यादा गहरा है। 12 किलोमीटर इस गड्ढे में अनेकों रहस्य छुपे हुए हैं जिसमें से कुछ  रहस्यों के बारे में बताया गया है। आइए जानते हैं कुछ विशेष और महत्वपूर्ण रहस्यों के बारे में।

      12 किलोमीटर गहरे इस गड्ढे को जब 7 किलोमीटर तक खोदा गया था तब वैज्ञानिकों को इस जगह पर पाए जाने वाले पत्थरों में जल मिला था। वैज्ञानिकों ने बताया यह जल वहां पर मौजूद ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के कारण मिला है।

      इस गड्ढे की सबसे बड़ी खोज यह थी कि इसमें वैज्ञानिकों को सूक्ष्मजीव भी मिले। इतने गहरे गड्ढे में वो भी इतने अधिक तापमान होने पर भी वहां किसी ने भी जीवन की कल्पना नहीं की थी क्योंकि धरती के अंदर गहराई में जाने पर तापमान लगातार बढ़ता रहता है। खोजकर्ताओं का मानना था कि यह सिर्फ एक ही प्रकार के सूक्ष्म जीव होंगे परंतु बाद की खोजो से पता चला कि एक नहीं बल्कि बहुत प्रकार के सुक्ष्मजीव वहां मौजूद थे जो कि बहुत ज्यादा पुराने पत्थरों में पाए गए थे। धरती के अंदर के ये पत्थर 2 बिलियन वर्ष पुराने हैं और आज भी उसी स्थिति में मौजूद है। खोजकर्ताओं को इस गड्ढे के नीचे हिलियम, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे बहुत सारे गैस भी मिले।

     सन् 1994 में कोला सुपरडीप होल को बंद कर दिया गया। खोजकर्ताओं का कहना था कि इस गड्ढे के सबसे अंतिम छोर में तापमान 180 डिग्री सेल्सियस था और इतने अधिक तापमान में कार्य जारी रखना संभव नहीं था। जैसा कि हम सभी जानते हैं 100 डिग्री सेल्सियस में पानी उबलने लगता है परंतु वहां तो तापमान 180 डिग्री सेल्सियस था इस कारण इस गड्ढे की खुदाई कार्य को बंद करना पड़ा। ऐसा खोजकर्ताओं ने बयान जारी किया था।

     इसके अलावा कुछ लोगों का यह भी मानना था कि उस गड्ढे से इंसानों के चीखने की आवाज आ रही थी इस कारण खोजकर्ता डर गए थे कि कहीं वह नरक तक खुदाई ना कर दे। कुछ खोजो में यह भी दावा किया गया था कि यह चीखे आत्माओं की है जो कि नरक में निवास करती है इस कारण इस गड्ढे को नरक का कुआं भी कहा जाता था। संभवतः यह बात महज़ एक झूठ हो सकती है क्योंकि ऐसा सिर्फ लोगों का अनुमान था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कुछ रहस्यमयी कारणों की वजह से इस गड्ढे को बंद कर दिया गया।

     इस कोला सुपरडीप होल को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है ताकि भविष्य में अगर कोई भी इस प्रोजेक्ट को पुनः चालू करवाना चाहे तो भी ना करा सके। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही रहस्यमयी और मजेदार आर्टिकल्स के लिए........
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कोई व्यक्ति कितने समय तक अकेले रह सकता है...?

अकेलापन एक ऐसा शब्द है जिसे हर कोई अपने जिंदगी में लाना चाहता है। दिनभर की परेशानियों, चिंताओ एवं शोर से भरी वातावरण से दूर हर कोई चाहता है कि उसे कुछ समय तक शांत एवं अकेलेपन का माहौल मिले। अकेलेपन की एक दूसरी वजह यह भी है कि लोग टेक्नोलॉजी में इतना विकसित हो चुके हैं कि लोग आपस में मेल मिलाप से दूर अपना अधिकांश समय कंप्यूटर, मोबाइल में व्यतीत करने लगे हैं। दोस्तों क्या कभी आपने कल्पना किया है कि आखिर कोई व्यक्ति कितने समय तक अकेले रह सकता है? क्या आपने कल्पना किया है कि अधिक समय तक अकेले रहने से किन-किन अजीब परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है? क्या अकेलापन हावी हो जाए तो लोग पागल भी हो सकते हैं? इन सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ प्रयोग किये है जिसका परिणाम नीचे बता रहा हूं जो कि संभवतः आपको हैरान कर देंगे।


  •      माइकल शिफ्रे का प्रयोग :-
     फ्रेंच एक्सप्लोरर माइकल शिफ्रे ने अकेलापन का दुष्परिणाम जानने के लिए खुद पर एक प्रयोग किया। इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य था कि अगर कोई अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में किसी दुर्घटना में फंस गया और उसे अकेले रहने जैसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा तो उसके दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ेगा। 14 फरवरी सन् 1972 को माइकल 6 महीने अर्थात् 180 दिनों के लिए टेक्सास के मिडनाइट नामक गुफा में रहने चले गए। वहां माइकल मोबाइल एवं इंटरनेट से दूर एक नायलाॅन के टेंट में रहते थे। उस समय उसके पास कुछ किताबें, सीडी प्लेयर और फ्रीजर के अलावा कुछ नहीं था। माइकल के भोजन की जिम्मेदारी नासा (NASA) ने ली थी ताकि माइकल के स्वास्थ्य पर नजर रखा जा सके। कुछ दिन अकेले रहने के बाद ही माइकल पर अकेलापन हावी होने लगा और वह कुछ भी अजीब अजीब बातें सोचकर दुःखी हो जाते थे। महज़ 77 दिनों के बाद ही माइकल को छोटी मोटी बातें याद रखने के लिए भी काॅपी-पेन का सहारा लेना पड़ा। 6 महीनों बाद जब माइकल वापस आए तो वह पागल तो नहीं हुआ परंतु वापस आने के तीन-चार सालों तक उसकी स्मरणशक्ति ठीक से काम नहीं करती थी और माइकल को कभी-कभी सदमे का दौरा भी पड़ता था।

  •   एडम ब्लूम का अकेलापन :- 
      बीबीसी ने माइकल शिफ्रे की प्रयोग की तरह ही एक और प्रयोग किया जिसमें 6 चुने हुए लोगों को न्यूक्लियर बंकर में 48 घंटे अकेले गुजारने थे। इन 6 लोगों में एडम ब्लूम नामक एक कॉमेडियन थे जिसने 2-4 घंटो तक गाना गाकर एवं चुटकुले बोलकर जल्दी-जल्दी समय बिताने का प्रयास किया। परंतु 18 घंटे बाद ही ब्लूम को सदमा एवं चिड़चिड़ापन आने लगा। 40 घंटे होते ही ब्लूम पर दृष्टिभ्रम (वहम) हावी होने लगा और उसके दिमाग ने खेल खेलना चालू कर दिया। ब्लूम को भूतियाॅ पैरों की आहट सुनाई देने लगी एवं और भी बहुत सारे वहम होने लगे। ब्लूम ने 48 घंटों का समय पूरा किया और न्यूक्लीयर बंकर से सही सलामत बाहर आ गया।

        इन प्रयोगो से स्पष्ट होता है कि अकेलेपन से लोग पागल तो नहीं हो सकते लेकिन पागलपन के बहुत करीब आ सकते हैं। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही चटपटी, रहस्यमयी एवं मजेदार आर्टिकल्स के लिए..........
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ये ग्रह पृथ्वी से टकराकर कर देगा पृथ्वी को नष्ट...

पिछले कुछ दशकों से मनुष्य तकनीकी ज्ञान में इतना विकसित हो चुका है कि हमें हमारे अंतरिक्ष के बारे में बहुत सारी रहस्यमयी और अदभुत जानकारी प्राप्त है। जिनमें से कुछ जानकारी अभी भी अनसुलझा हुआ रहस्य है। इसी अनसुलझी हुई जानकारी के क्रम में हमें एक ऐसी क्षुद्रग्रह के बारे में जानकारी मिली है जिसके अध्ययन से हमें पृथ्वी की संरचना एवं बनावट के संबंध में बहुत सारी रहस्यमयी जानकारी प्राप्त हो सकती है। यह क्षुद्रग्रह आदिकाल में पृथ्वी का ही एक हिस्सा था जो कि किसी कारणवश पृथ्वी से अलग हो गया था। ये क्षुद्रग्रह आज भी पृथ्वी से बहुत दूर है और अपनी कक्ष में सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि यह क्षुद्रग्रह एक दिन पृथ्वी से टकरा जाएगा और पृथ्वीवासियों को इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ सकता है। आइए दोस्तों जानते हैं इस क्षुद्रग्रह के बारे में विस्तार से और उस दिन का जिस दिन या क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराएगा।



       11 सितंबर सन् 1999 को "लिंकल्न नियर-अर्थ स्टीरॉयड रिसर्च (LINEAR)" ने एक छुद्रग्रह की खोज की।  23 सितंबर सन् 1999 को "डीप स्पेस नेटवर्क" से राडार इमेजिंग के द्वारा इस क्षुद्रग्रह की तस्वीरें खींची गई। यह धरती के बहुत करीब से गुजरा था। इस क्षुद्रग्रह का नाम बेन्नू 101955 (BENNU 101955) रखा गया था। यह बेनू नामक क्षुद्रग्रह हमें हमारे अस्तित्व के बारे में बताने वाला है क्योंकि यह पहले हमारी धरती का ही एक भाग था। यह कार्बोनेेशियस क्षुद्रग्रह(बेनू) धरती के कक्ष के बहुत नजदीक से ही सूर्य की परिक्रमा करता है।

      18 सितंबर सन् 2016 को OSIRIS-REx प्रक्षेपित किया गया जिसका उद्देश्य था बेनू क्षुद्रग्रह पर लैंड कर उसका सैंपल लेकर वापस धरती पर आना। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार सितंबर 2023 तक OSIRIS-REx वापस धरती पर आ जाएगा। अर्थात यह मिशन 7 वर्षों तक चलेगा। यह मिशन सुनने में जितना आसान लग रहा है वास्तव में उतना आसान नहीं है। इस मिशन की कुल लागत 800 मिलीयन डॉलर है यानी कि 5,55,52,00,00,000 रुपए है।

      ताजा जानकारी के अनुसार 3 सितंबर सन् 2018 को OSIRIS-REx 2 सालों के लंबे समय अंतराल के बाद छुद्र ग्रह बेनू के बहुत नजदीक तक पहुंच चुका है। इस OSIRIS-REx ने बेनू की एक स्पष्ट तस्वीर भी भेजी है। इन तस्वीरों की मदद से हमें पहली बार ऐसा मौका मिला है कि हम किसी छुद्रग्रह को इतने करीब से देख सके हैं।

     वैसे तो सौरमंडल में बहुत सारे क्षुद्रग्रह है परंतु यह बेनू नामक क्षुद्रग्रह हमारे लिए कुछ ज्यादा ही विशेष प्रकार का है। देखने में यह क्षुद्रग्रह लड्डू की तरह गोल घूमती हुई दिखाई देती है। यह क्षुद्रग्रह 4.3 घंटों में अपने अक्ष पर एक परिक्रमा पूर्ण करता है। बेनू की परिक्रमा करने की गति समय के साथ लगातार बढ़ती जा रही है। गणना के अनुसार वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सितंबर सन् 2060 में बेनू धरती से करीब 7 लाख 50 हज़ार किलोमीटर दूर से गुजरेगा और सितंबर सन् 2135 में करीब 3 लाख किलोमीटर की दूरी से धरती से गुजरेगा अर्थात चांद जितनी दूरी से धरती से गुजरेगा। सितंबर सन् 2175 में बेनू धरती से टकरा सकता हैए परंतु इसकी संभावना बहुत ही कम है। इस क्षुद्रग्रह का धरती पर टकराने की संभावना 24 हज़ार में से एक (1/24,000) है। परंतु फिर भी अगर यह बेन्नू धरती से टकरा गया तो पूरे एक शहर को नष्ट करने की क्षमता रखता है। चूंकि बेनू की धरती पर टकराने का समय अभी बहुत दूर है इस कारण वैज्ञानिक अभी सिर्फ बेनू के अध्ययन पर लगा हुआ है जिससे कि हमें निश्चित ही हमारे उत्पत्ति एवं ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संबंध में बहुत सारी रहस्यमयी जानकारी प्राप्त हो सकती है।

       सितंबर सन् 2023 को OSIRIS-REx बेनू पर अपना मिशन पूरा करके वापस धरती पर आएगा अर्थात बेनू की सतह की कुछ सैंपल लेकर वापस धरती पर आएगा। जिसके अध्ययन से हमें निश्चित ही बहुत सारी नयी जानकारी प्राप्त हो सकती है। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसी ही चटपटीए मजेदार और रहस्यमयी आर्टिकल्स के लिए...



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अमेरिका ने क्यों गिराया था जापान पर परमाणु बम...?

      युद्ध की स्थिति इतनी दुखद और विनाशकारी होती है कि चाहे कोई भी देश जीते या हारे नुकसान तो दोनों पक्षों का होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक ऐसा ही भयानक मंज़र देखने को मिला जब अमेरिका ने जापान के दो प्रमुख शहरों हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम से हमला किया था। इन दोनों शहरों में हुई बमबारी से जापान को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ और उनके बहुत सारे सैनिकों सहित 2 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। दोस्तों प्रश्न यह बनता है कि अमेरिका ने आखिर जापान के इन दोनों शहरों को ही क्यों चुना और ऐसी क्या वजह थी जिसके कारण अमेरिका को इतने खतरनाक परमाणु बम का सहारा लेना पड़ा ?  आइए दोस्तों जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब और इस बमबारी से संबंधित कुछ रोचक बातें।



      द्वितीय विश्वयुद्ध की यह लड़ाई दो समूहों के बीच थी। पहले समूह एक्सिस पावर जिसमें जर्मनी, इटली, जापान, हंगरी जैसे और भी बहुत सारे देश शामिल थे। वहीं दूसरी ओर एलाइड पावर में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और बहुत सारे देश शामिल थे। हिटलर की मृत्यु हो जाने से जर्मनी की नाज़ी सेना कमजोर हो गई और आत्मसमर्पण कर गई। जर्मनी के युद्ध से हट जाने से एक्सिस पावर एलाइड पावर की तुलना में कमजोर होने लगी। हालांकि जापान जैसी मजबूत देश अभी भी एक्सिस पावर में थी। परंतु जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया जापान की शक्तियां भी कमजोर होने लगी। फिर भी जापान के राजा हीरोहीतो आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि हम अपनी आखरी सैनिक तक लड़ेंगे और हार नहीं मानेंगे। इस तरह द्वितीय विश्व युद्ध लगातार चलता रहा और दोनों पक्षो को नुकसान होता रहा। ऐसी स्थिति में जापान को रोकने और द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म करने के लिए अमेरिका को कुछ बड़ा कारनामा करना था। 16 जुलाई 1945 को अमेरिका ने परमाणु बम बनाकर उसका सफल परीक्षण भी कर लिया। इसी समय जापान भी ऑपरेशन डाऊनफाल के नाम से अमेरिका पर बड़ा हमला करने की तैयारी में था। इसकी खबर अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमन को मिली तो उसने अपने देश के बड़े अधिकारियों से मिलकर जापान पर परमाणु हमले की तैयारी शुरू कर दी।

     परमाणु हमला करने से पहले देश को किसी दूसरे देश से सहमति लेनी पड़ती है इसलिए अमेरिका ने यूनाइटेड किंगडम से परमाणु हमले की सहमति ले ली।

  पहला परमाणु हमला :
       6 अगस्त 1945 को 8:45 में अमेरिका ने एयरक्राफ्ट द्वारा जापान के हिरोशिमा में बम गिरा दिया। इस बम को एयरक्राफ्ट से जमीन पर पहुंचने में कुल 44 सेकंड लगे थे। इस बम का नाम "लिटिल ब्वॉय" रखा गया था। इस परमाणु हमले से हिरोशिमा के लगभग 80,000 लोग मारे गए। चूंकि जापान का यह हिरोशिमा शहर सैनिक महत्व वाला था इस कारण यहां पर सर्वप्रथम परमाणु हमला किया गया। इस परमाणु हमले से हिरोशिमा की लगभग 30% आबादी खत्म हो गई।

  दूसरा परमाणु हमला :
      9 अगस्त 1945 को 11:02 पर अमेरिका ने जापान के नागासाकी पर एक और परमाणु हमला कर दिया। हालांकि यह दूसरा परमाणु बम जापान के औद्योगिक शहर कोकुरा में गिराना था परंतु खराब मौसम की वजह से यह दूसरा बम नागासाकी में ही गिराना पड़ा। यह दूसरा परमाणु बम नागासाकी की जमीन से 500 फीट ऊपर ही फट गया। आसपास पहाड़ होने की वजह से इस दूसरे बम का प्रभाव उतना ना रहा जितना की खतरनाक प्रभाव हिरोशिमा पर गिराए गए बम का था। इस दूसरे परमाणु बम का नाम "फैट मैन" रखा गया था। इस दूसरे परमाणु हमले से 40,000 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी इसके अलावा रेडिएशन की वजह से और भी अनेक लोग मारे गए।

     हिरोशिमा एवं नागासाकी में हुए इस परमाणु हमले के बाद जापान के राजा हीरोहीतो ने 14 अगस्त 1945 को अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि अगर जापान अभी भी आत्मसमर्पण नहीं करता तो जापान पर एक और तीसरा परमाणु हमला अमेरिका 19 अगस्त को करने वाला था।

    1945 में जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी पर हुए इन दो खतरनाक परमाणु हमले के बाद भी 1964 में जापान ने विश्व खेल जगत की सबसे बड़ी इवेंट टोक्यो ओलंपिक की मेजबानी की थी। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही चटपटी, रहस्यमयी मजेदार आर्टिकल्स के लिए......


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ऐसी पुस्तक जिसे नाही कोई समझ पाया और नाही कोई पढ़ पाया...

यूं तो दोस्तों इस दुनिया में बहुत सारे सुलझे . अनसुलझे रहस्य मौजूद है परंतु दोस्तों आज हम आपको बताएंगे एक ऐसी रहस्यमयी किताब के बारे में जिसके रहस्य को आज तक कोई नहीं सुलझा सका। इस रहस्यमयी किताब का नाम है वायनिक मनुस्क्रिप्ट। इस किताब को वायनिक पांडुलिपि भी कहा जाता है। इस किताब में लिखी हुई लिपि इतनी रहस्यमयी है कि आज तक कोई भी लिपि विद्या जानने वाला या कोई भी व्यक्ति इस किताब को पढ़ या समझ नहीं पाया। माना जाता है कि इस रहस्यमयी किताब के अंदर प्राचीन इतिहास एवं खगोल शास्त्रए आयुर्वेदए जादूगरी जैसे बहुत सारे रहस्य छुपे हो सकते है। आइए दोस्तों जानते हैं इस रहस्यमयी किताब के बारे में कुछ महत्वपूर्ण एवं रोचक बातें।


      वायनिक मनुस्क्रिप्ट नामक यह रहस्यमयी किताब 600 वर्ष पूर्व 15 वीं सदी में लिखी गई थी। इस किताब के लेखक रोजर बेकॅन को माना जाता है। यह किताब 240 पन्नो की है। इस 240 पन्नो में से अभी तक एक अक्षर को भी नहीं समझा जा सका हैं। इस किताब की पन्ने चमड़े के बने हुए हैं। इसके पन्ने एवं स्याही की कार्बन डेटिंग पद्धति द्वारा अध्ययन करने पर पता चला है कि यह किताब 15वीं सदी में लिखी गई थी। इस किताब को 6 भागों में बांटा गया है। इन भागों में अंकित चित्रों द्वारा इस रहस्यमयी किताब के बारे में कुछ हद तक जानकारी प्राप्त हुई है।

  • पहला भाग : 

     वायनिक मनुस्क्रिप्ट नामक इस किताब के पहले हिस्से में खगोल विज्ञान के बारे में बताया गया है। पहले भाग में सूर्यए चंद्रमा और तारों के चित्र देखने को मिलते हैं।

  • दूसरा भाग :

     दूसरा भाग जीव विज्ञान से संबंधित है। इस भाग में मानव अंगो के विभिन्न चित्र देखने को मिलते हैं।

  • तीसरा भाग :

     तीसरा भाग ब्रह्मांड विज्ञान से संबंधित है क्योंकि इस भाग में बहुत सारे गोल संरचनाएं दिखाई देती है।

  • चौथा भाग :  

      इस किताब का चौथा भाग पेड़ . पौधों से संबंधित है। इस भाग में कुछ ऐसे पौधों के भी चित्र दर्शाए गए हैं जो कि इस पृथ्वी पर मौजूद ही नहीं है।

  • पांचवा भाग :

      पांचवा हिस्सा जड़ी बूटियों एवं आयुर्वेद से संबंधित है जिसमें संभवतः विभिन्न औषधियों के बारे में बताया गया है।

  • छठवां भाग :

     वायनिक मनुस्क्रिप्ट नमक इस रहस्यमयी किताब का छठवां और आखिरी हिस्सा सबसे ज्यादा रहस्यमयी है क्योंकि इस हिस्से में कोई भी चित्र अंकित नहीं है और कुछ विशेष प्रकार की लिपि में कुछ लिखा गया है जिसे आज तक कोई भी समझ नहीं पाया। इसी कारण से इस भाग को समझ पाना बेहद मुश्किल है‌

     ऐसा प्रतीत होता है कि इस रहस्यमयी किताब की लिपि को समझ पाना लगभग मुश्किल ही है क्योंकि बहुत से लिपि विद्या जानने वाले इस किताब को समझने की कोशिश कर चुके हैं परंतु वे सभी असफल ही रहे हैं।

    संभवतः दोस्तों वायनिक मनुस्क्रिप्ट नामक इस रहस्यमयी किताब की लिपि अगर समझ आ गयी तो हमें प्राचीन इतिहास के बारे में एवं विभिन्न प्रकार की दुर्लभ जानकारी प्राप्त हो सकती है। परंतु दोस्तों क्या कभी हम इस रहस्यमयी किताब में लिखी हुई बातों को जान पाएंगे... 

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