• जानिये फांसी देने के पूर्व कैदी के कान में जल्लाद क्या कहता है... ईनाम...

    नमस्कार दोस्तो आज हम आपको ले जायेंगे एक ऐसे रहस्य की ओर जिसको आप भी जानना चाहेंगे, दोंस्तो अक्सर आपने फिल्मो मे देखा होगा या कहीं से सुना होगा की किसी अपराधी को फंासी पर चढाने के पूर्व जल्लाद कैदी के कानो मे कुछ कहता है। तो दोस्तो आज हम आपको इस रहस्य से वाकिफ कराना चाहेंगे । नको ईनाम भी दिया जाता है।

  • माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स

    दोस्तो आज हम बात करेंगे माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स के बारे में। दोस्तो माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स लडकियाॅ थी।

  • जानिए दुनिया में जन्म लेने वाला पहेला इंसान कौन था...

    नमस्कार दोस्तो, हर कोई जानना चाहता है की दुनिया में जन्म लेने वाला पहेला इंसान तो आइये आज हम जानते है हमारे अस्तित्व के बारे मे, आइये जानते है हमारे इतिहास को । इसके अलावा आज हम आपको बतायेंगे उस महिला के बारे मे जिसने दुनिया पर पहली बार बच्चा पैदा किया।

रेल की पटरियों के बिच में पत्थर क्यों बिछाये जाते है...?


दोस्तों रेलगाड़ी में आपने तो बहुत बार सफर किया होगा परंतु दोस्तों क्या कभी आपने गौर किया है कि आखिर इतनी भारी भरकम रेलगाड़ी जो कि करीब 10000 किलो की होती है इतनी भारी वजन को सिर्फ दो मामूली पटरिया ही कैसे सह पाती है। क्या कभी आपने कल्पना किया है कि पटरी के नीचे गिट्टी क्यों बिछाया जाता है अगर आपका ऐसा मानना है कि सिर्फ पटरिया ही रेलगाड़ी का वजन थामें रखती है या रेलगाड़ी का सही एवं सुरक्षित रूप से चलने का कारण सिर्फ पटरिया ही है तो आप बिल्कुल गलत है। तो आइये जानते है की रेलगाड़ी का वजन सहन करने में क्या क्या मदद करता है। 



  • स्लीपर्स या प्लेट्स :
          रेल की पटरी को जमीन से थोड़ा ऊपर बनाया जाता है क्योंकि पटरी के नीचे और भी बहुत सारे परतों को बिछाया जाता है। सबसे ऊपर में पटरी होती है पटरी के नीचे कंक्रीट के बने प्लेट्स होते हैं जिसे स्लिपर्स कहते हैं। ये  स्लिपर्स दो पटरी के बीच की दूरी को एक समान बनाए रखती है। यदि पटरियों पर स्लीपर्स ना हो तो जब रेलगाड़ियां पटरी में से होकर चलेगी तो दोनों पटरिया अपने निश्चित जगह में से हट जाएंगे जिससे दुर्घटना होना अनिवार्य है। इस कारण दो पटरियों को निश्चित जगह पर बनाए रखने के लिए स्लीपर प्लेट्सद्ध  लगाया जाता है। यह स्लिपर्स कांक्रीट की बनी होती है जो दोनों पटरियों को आपस में निश्चित दूरी तक जकड़े रखती है।

  • गिट्टी (पत्थऱ) :
        पटरी एवं स्लिपर्स के नीचे गिट्टी को बिछाया जाता है। रेलगाड़ी की संपूर्ण भार का दबाव इन्हीं गिट्टियों पर पड़ता है। ये गिट्टियां विशेष प्रकार से टेढ़ी.मेढ़ी आकृतियों की होती है ताकि रेलगाड़ी का वजन पड़ने पर भी ये गिट्टियां अपने मूल स्थान से ना हटे। अगर इन गिट्टियों के अलावा गोल पत्थरों का इस्तेमाल किया जाए तो यह पत्थर रेत का वजन पड़ते ही अपने मूल स्थान से हट जाएंगे और इससे संभवतः ही बहुत बड़ी दुर्घटना हो सकती है। इसी कारण से विकृत आकार वाले गिट्टियों का उपयोग किया जाता है।

        इसके अलावा गिट्टियों की उपस्थिति पटरी पर पानी के जमाव को रोकती है। अगर गिट्टी ना हो तो पटरी पर मिट्टी होने के कारण पेड़ पौधे या झाड़ियां भी उग सकते हैं। इन्हीं सब कारणों के कारण पटरियों पर गिट्टी का बिछाया जाना अनिवार्य होता है।

        गिट्टी के नीचे और भी कुछ परतें बिछाई जाती है जो कि पटरियों को सहारा प्रदान करने के लिए आवश्यक होती है। परंतु दोस्तों मेट्रो ट्रेन्स की पटरियों पर गिट्टी नहीं बिछाई जाती क्योंकि यह सामान्य रेलगाड़ियों की अपेक्षा हल्की होती है। इसके अलावा इसकी अधिकांश पटरिया अंडरग्राउंड एवं ओवरब्रिज पर होती है।

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इन पौधों के पास गलती से भी ना जाये...

कुदरत का करिश्मा कुछ इस प्रकार से देखने को मिला है कि इस धरती पर विविध प्रकार के अजीबोगरीब जीव . जंतु एवं पेड़ . पौधे पाए जाते हैं। कुछ जीव मांसाहारी होते हैं तो कुछ शाकाहारी एवं अधिकांश पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं। दोस्तों क्या कभी आपने कल्पना किया है कि आखिर कोई पौधा भी मांसाहारी हो सकता है। दोस्तों कुदरत का करिश्मा कुछ इस प्रकार से बरसा है कि हमें इस धरती पर एक नहीं बल्कि बहुत सारे मांसाहारी पौधे देखने को मिलते है। ये मांसाहारी पौधे देखने में जितना सुंदर होते हैं उतना ही खतरनाक भी होते हैं। आइए दोस्तों जानते हैं कुछ ऐसे ही मांसाहारी पौधों के बारे में जो भोजन के रूप में मांस का सेवन करते हैं।



  • नीपेन्थिस : 

     सुराहीनुमा दिखने वाला यह पौधा अत्यंत सुंदर दिखाई देता है। कुछ छोटे छोटे जीव इसके फंदे में आ जाते हैं और अपनी जान गंवा बैठते हैं। इसकी सुंदरता एवं बनावट से मोहित होकर कुछ जीव इसके करीब आ जाते हैं और इसके सुराहीनुमा संरचना में फंस जाते हैं। इस पौधे के अंदर उपस्थित खास तरह के द्रव्य के द्वारा फंसे हुए छोटे जीव का पूरी तरह से पाचन कर लिया जाता है। इस पौधे को एशियन पिचर के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधा छोटे मेंढको सहित कीट पतंगों को  अपना शिकार बना लेता है।

  • ड्राॅसेरा :

           यूरोप के कुछ स्थानों में पाया जाने वाला यह भी एक मांसाहारी पौधा है। इसके निचले भाग में एक सुगंधित द्रव्य पाया जाता है जिसे नेक्टर कहते हैं। छोटे जीव एवं कीट पतंग सुगंधित द्रव्य से आकर्षित होकर इसके करीब आते हैं और इस पौधे की चिपचिपी रेशे में फंस जाते हैं और अपनी जान गवां बैठते हैं।

  • डायोनिमा म्यूसीपुला :

       यह मांसाहारी पौधा बाकी मांसाहारी पौधों में से सबसे खतरनाक है। दूसरे मांसाहारी पौधे नेक्टर द्रव्य आदि अन्य तरीकों से शिकार करते हैं परंतु डायोनिमा म्यूसीपुला अपने शिकार पर घात लगाकर शिकार करता है। यह पौधा जबड़े की संरचना जैसी दिखाई देता है। जैसे ही कोई कीट पतंग या छोटे जीव इसकी पत्तियों में आकर बैठते हैं यह उसे अपना शिकार बना लेता है और तब तक जकड़ के रखता है जब तक उसको पूरी तरह से हजम ना कर लें। इसी कारण दोस्तों इसे सबसे खतरनाक मांसाहारी पौधा माना जाता है।

        यूं तो दोस्तों इस दुनिया में बहुत सारे मांसाहारी पौधे पाए जाते हैं परंतु यहां हमने सिर्फ कुछ ही मांसाहारी पौधो के बारे में बताया है। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसी ही चटपटीए मजेदार और रहस्यमयी जानकारी के लिए...


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एक जवान, ७२ घंटे और ३०० खतरनाक दुश्मन...

दोस्तों यह एक सच्ची घटना है। यह घटना है सन् 1962 की भारत और चीन के बीच लड़ाई की। चीन ने अरुणाचल प्रदेश में कब्जा करने के उद्देश्य से हमला कर दिया। चीनी सैनिकों द्वारा की गई इस हमले से भारतीय सैनिकों को काफी नुकसान हुआ और भारतीय सैनिकों की स्थिति कमजोर होने लगी तब वहां तैनात गढ़वाली यूनिट की चौथी बटालियन सेना को वापस बुला लिया गया। वापस बुलाए जाने के बाद भी लांस नायक त्रिलोकी सिंह, गोपाल और राइफलमैन जसवंत सिंह रावत वापस नहीं लौटना चाहते थे इसलिए सब मिलकर चीनी सैनिकों का डटकर सामना करने लगे।



    जब जसवंत सिंह रावत अपने साथियों के साथ चीनी सैनिकों से लड़ रहे थे उस वक्त जसवंत सिंह रावत की उम्र महज 21 वर्ष थी। जसवंत सिंह में देश प्रेम का जज़्बा इतना ज्यादा था कि सिर्फ 17 वर्ष की उम्र में वह सेना में भर्ती होने चले गए थे परंतु उस समय उम्र कम होने के कारण उसे सेना में भर्ती नहीं लिया गया। 19 अगस्त 1960 को जसवंत सिंह को राइफलमैन के रूप में सेना में शामिल किया गया। 14 सितंबर 1961 को उनकी ट्रेनिंग पूरी हुई। ट्रेनिंग पूरी होने के एक वर्ष बाद ही अर्थात 17 नवंबर 1962 को जसवंत सिंह को चीन के विरुद्ध यह लड़ाई लड़नी पड़ी। बाकी सिपाहियों के शहीद हो जाने के बाद भी जसवंत सिंह चीनी सेना से डटकर मुकाबला करते रहे और चीनी सैनिकों के ईट का जवाब पत्थर से देने लगे।
    नूरारंग की इस लड़ाई में चीनी सेना मीडियम मशीन गन (MMG) से ज़ोरदार फायरिंग कर रही थी, जिससे गढ़वाल राइफल्स के जवान मुश्किल में थे तब ये तीनों भारी गोलीबारी से बचते हुए चीनी सेना के बंकर के करीब जा पहुंचे और दुश्मन सेना के कई सैनिकों को मारते हुए उनसे उनकी MMG छीन ली तब कुछ चीनी सैनिको ने आकर उनका हमला कर दिया और जसवंत सिंह का एक साथी वह शहीद हो गए और जसवंत सिंह  चिनिओ का जवाब देते रहे और MMG को भारतीय बंकर तक पहुंचाने का काम गोपाल सिंह ने किया। 

     चीनी सैनिकों से लड़ते हुए लांस नायक त्रिलोकी सिंह और गोपाल भी शहीद हो गए। उस समय अकेले जसवंत सिंह ही बच गए थे और सामने थी चीन की विशाल सेना। तब उनकी मदद नूरा नाम की लड़की ने की थी।  माना जाता है की नूरा, जसवंत सिंह को पसंद करती थी इसीलिए वहा उनका साथ देने गयी थी और उसे भी चीनी सेना ने मार दिया था।  मुझे ये तो नहीं पता की सच में कोई नूरा थी भी या नहीं पर आज भी उस इलाके में कभी कभी उन दोनों की इस हिम्मतभरी प्रेमकहानी के चर्चे सुनाई पड़ते है। 

     जसवंत सिंह अकेले ही 10 हज़ार फीट ऊंची अपनी पोस्ट पर डटे हुए थे तब भी ऐसे विकट परिस्थितियों में भी जसवंत सिंह हार नहीं माने और लगातार 72 घंटों तक बिना कुछ खाए पिए भूखे पेट चीनी सैनिकों से अकेले लड़ते रहे। उस समय जसवंत सिंह अलग.अलग बंकरों में जाकर फायरिंग कर रहे थे जिससे चीनी सैनिकों को लग रहा था कि सभी बंकरो में बहुत सारे सैनिक है परंतु असल में सिर्फ जसवंत सिंह अकेले सैनिक थे। इस तरह जसवंत सिंह ने असाधारण बुद्धि और साहस का प्रयोग करके चीनी सैनिकों को दुविधा में डाल रखा था। जसवंत सिंह ने अकेले लगभग 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया और जब अंत में उसकी सारी गोलियां खत्म हो गई थी थी और वो पूरी तरह घायल भी हो चुके थे तो चीनी सैनिकों ने उन्हें बंदी बनाकर मार डाला लेकिन तब तक भारतीय सेना की और टुकड़ियां युद्धस्थल पर पहुंच गईं और चीनी सेना को रोक लिया। इस बहादुरी के लिए जसवंत सिह को महावीर चक्र और त्रिलोक सिंह और गोपाल सिंह को वीर चक्र दिया गया।

     जिस स्थान पर जसवंत सिंह चीनी सैनिकों से जंग लड़े थे वहां पर जसवंत सिंह रावत का मंदिर भी बनाया गया है। उस मंदिर में जसवंत सिंह रावत की सारी वस्तुओं जैसे कपड़े, जूते, चप्पल, बेल्ट, राइफल, खाली कारतूस आदि अन्य वस्तुओं को सुरक्षित रखा गया है। साथ साथ आपको एक और रोचक बात बता दे की उनकी वर्दी को आज भी प्रेस किया जाता है।

    तो दोस्तों यह थी हमारे भारत के बहादुर सिपाही राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की सच्ची घटना जिसने 72 घंटों तक भूखे पेट अकेले ही चीनी सैनिकों को रोक रखा था और माना जाता है की उनकी आत्मा आज भी वो एरिया की रक्षा करती है।

      दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए ताकी और लोग भी जान सके भारत के इस वीर सपूत की बहादुरी के बारे में और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही आने वाले आर्टिकल्स की जानकारी पाने के लिए ... 


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दुनिया की सब से लम्बी पगड़ी....

       नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का। दोस्तों जैसा कि हम सभी जानते हैं इस दुनिया में कई प्रकार की अजीबोगरीब घटनाएं होती रहती है कहीं पर कुदरत का करिश्मा देखने को मिलता है तो कहीं पर अकल्पनीय चमत्कार। इस दुनिया में अनेकों व्यक्ति एक से बढ़कर एक विश्व रिकार्ड बनाते जा रहे हैं ऐसे में हम आपको आज एक अद्भुत विश्व रिकॉर्ड के बारे में बताएंगे। आज हम बात करेंगे एक ऐसे बाबा के बारे में जिसकी पगड़ी ने बना दिया विश्व रिकॉर्ड आइए दोस्तों जानते हैं इस अद्भुत विश्व रिकॉर्ड के बारे में ।
        


       पगड़ी सिखों की शान होती है। कोई छोटी पगड़ी पहनता है तो कोई बड़ी पगड़ी पहनता है मगर दोस्तों क्या कभी आपने कल्पना की है कि कोई व्यक्ति अधिक से अधिक कितनी बड़ी पगड़ी पहन सकता है दोस्तों आज हम बताएंगे एक ऐसे बाबा के बारे में जो कुतुबमीनार से भी 9 गुना ज्यादा लंबी पगड़ी पहनता है आइये दोस्तों जानते हैं इस अनोखी विश्व रिकॉर्ड के बारे में।

       सामान्य रूप से पहने जाने वाली पगड़ी की लंबाई 5 से 6 मीटर तक होती है परंतु पटियाला में रहने वाले 62 वर्षीय अवतार सिंह जी 645 मीटर लंबी पगड़ी पहनते हैं, जी हां दोस्तों 645 मीटर लंबी पगड़ी। दिल्ली के कुतुबमीनार की ऊंचाई 73 मीटर है जबकि अवतार सिंह जी की पगड़ी 645 मीटर लम्बी है अर्थात कुतुबमीनार से 9 गुना बड़ी। इस 645 मीटर लंबी पगड़ी को पहनने में बाबा जी को 6 घंटे का समय लगता है। अवतार सिंह की पगड़ी और उसके कड़े सहित पगड़ी का कुल वजन 126 किलो होता है। जरा सोचिए दोस्तों सामान्य मनुष्य के लिए 100 किलोग्राम वजन उठाना भी मुश्किल होता है परंतु यहां बाबाजी 126 किलो की पगड़ी अपने सिर पर पहनते हैं। अवतार सिंह का यह कारनामा विश्व रिकॉर्ड बना चुका है।

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127 घंटों तक मौत से सामना...

        नमस्कार दोस्तों पिछले कुछ आर्टिकल्स में हम आपको विभिन्न प्रकार के रहस्यो के बारे में जानकारी दे चुके हैंए परंतु दोस्तों आज आपको बताएंगे एक ऐसी सच्ची घटना के बारे में जिसको जानकर निश्चित ही आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। दोस्तों आज हम बात करेंगे एक रियल हीरो एरन राल्स्टन के बारे में जिन्होंने खुद को जिंदा रखने के लिए अपने हाथ को काट दिया जी हां दोस्तों एरन राल्स्टन एक ऐसी जगह पर फंस गए थे जहां से उसको जिंदा बचकर निकलने के लिए अपने एक हाथ को काटना पड़ा। आइए दोस्तों जानते हैं इस सच्ची घटना के बारे में विस्तार से।
      
       यह घटना है अप्रैल 2003 की जब पर्वतारोही एरन राल्स्टन केन्याॅनलैण्ड्स नेशनल पार्क गए थे। एरन राल्स्टन जब ब्लूजाॅन में अंडरग्राउंड पुल में चढ़ाई कर रहे थे तब वह फिसल कर नीचे गिरने लगे एवं उसके साथ ही एक बड़ा सा बोल्डर भी गिर रहा था। एरन राल्स्टन कर दायाॅ हाथ कलाई तक उसी बोल्डर एवं पत्थर की दो दीवारों के बीच फंस गया। एरन राल्स्टन ने दीवार एवं बोल्डर के बीच फंसे अपने हाथ को निकालने के लिए बहुत प्रयास किया परंतु वह असफल रहा। जब उसनेे मदद के लिए आवाज लगाई तो उसे एहसास हुआ कि वह अकेला है। एरन राल्स्टन को दीवार के बीच फंसे हुए 4 दिन हो गए थे परंतु उसे किसी भी प्रकार से मदद नहीं मिली तब उसने अपने हाथ को काटने की सोची परंतु उसके पास पर्याप्त औजार नहीं होने के कारण वह ऐसा नहीं कर पाया जब पांचवें दिन वह सोया तो उसे अपने भविष्य एवं परिवार के बारे में सपना आया तब छठवें दिन उसने इस सपने को अपनी प्रेरणा बना लिया और उसके पास मौजूद पॉकेट नाइफ से दीवारों के बीच बोल्डर में फंसे हाथ को काट लिया और जिंदा बच गया 127 घंटों का वह समय एरन राल्स्टन का सबसे दुखद समय था परंतु इसी समय में उसने अपने मौत को भी हरा दिया और जिंदा बच गया।

       एरन राल्स्टन की इस दुखद घटना पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी थी जिसका नाम है "127 Hours"। दोस्तों सिर्फ एरन राल्स्टन ही नही बल्कि ऐसी और भी बहुत सी सच्ची घटनाएं है जिनमें कुछ बेमिसाल व्यक्ति विशेष ने मौत को भी हराकर अपनी मिसाल कायम की हैं। इन विशेष व्यक्तियों एवं इनके मौत को हराने  वाली सच्ची घटना को हम आपको  अगले आर्टिकल में जरूर बताएंगे।
      
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कराइ जा रही थी सचिन की शादी इस अभिनेत्री से फिर सचिन ने कहा - मैं तो....


     क्रिकेट जगत  में  मास्टर ब्लास्टर और क्रिकेट जगत भगवान से पहचाने जाने वाले सचिन तेंदुलकर की बोलर्स की नींद हराम करने वाली बैटिंग और उनके रिकार्ड्स के बारे में आप सब जानते ही  है की  इसलिए यहाँ हम उनके क्रिकेट के मैदान की अकल्पनीय बैटिंग के बारे में बताने नहीं जा रहे है पर उनकी छुपी हुई बैटिंग के बारे में बताने जा रहे है जिसे आप शायद ही जानते होंगे। तो आइये जानते है  सचिन की इस छुपी हुई बैटिंग के बारे में.... 

       इस आर्टिकल में हम आपको सचिन की लव स्टोरी के बताने जा रहे है। सचिन जब युवा क्रिकेटर थे तब वो भारत के मोस्ट बैचलर्स के नाम से जाने जाते थे और  उनके पीछे बहुत सारी लड़किया पागल थी। साल १९९३ - ९५ में जब सचिन की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी तब  सचिन का नाम एक अभिनेत्री से जोड़ा जा रहा था और इतना ही नहीं उनकी शादी की खबरे भी मीडिया में ट्रेंडिंग थी। और खबरों के अनुसार उनकी शादी भी होने वाली थी। 




      अब आप सोच रहे होंगे की वो कोनसी अभिनेत्री थी जिनके साथ सचिन का नाम जोड़ा जा रहा था तो आप को बता दे की वो अभिनेत्री थी शिल्पा शिरोडकर। खबरों के मुताबिक दोनों मराठी थे और दोनों उच्च ज्ञाति के भी थे तो उनकी शादी में कोई समस्या नहीं थी  पर मीडिया के इस प्लान की पोल खुल गयी तब सचिन ने सामने से आकर बड़ा निवेदन दिया था की - मै तो उनको जानता तक नहीं हु। 

     जब सचिन और शिल्पा शिरोडकर की खबरे वायरल हो रही थी तब सचिन ने मीडिया के सामने आके बताया था की ये सब अफवा है क्योकि वो  कभी उनसे मिले नहीं है और नाहीं  उनको अच्छे से जानते है तो फिर शादी और अफैर कैसे हो सकता है। खैर, सचिन का नाम भले ही शिल्पा से जोड़ा जा रहा था पर वो तो एक लड़की के प्यार में क्लीनबोल्ड हो चुके थे और नहीं उसके बारे में किसी को पता था और अचानक ही सचिन ने अपनी शादी की घोषणा कर दी थी। 

     जब मीडिया एक तरफ उनका नाम उनके बचपन की फ्रेंड के साथ जोड़ रही थी तब दूसरी और सचिन एक लड़की के प्यार में पागल हो गए थे और वो लड़की का नाम था अंजलि। अंजलि से सचिन को पहली नजर वाला प्यार हुआ था और दोनों ने ३ साल तक एकदूसरे को डेट भी करते रहे। अचानक सचिन ने उनसे ५ साल बड़ी अंजलि के साथ अपनी शादी की अनॉउंसमेंट की तो सब हैरान हो गए थे। 

     सचिन की शादी मुंबई की एक रेस्टोरेंट में हुई थी तब लगभग १००-१५०  लोग वहा हाजर थे।  उस सब सचिन को एक चॅनेल ने १ लाख देकर उनकी शादी को लाइव टेलीकास्ट करने की ऑफर दी थी पर सचिन ने मना कर  दिया था और बताया था  शादी उनका अंगत मामला है।  आपको बता दे की सचिन की शादी २५ मई, १९९५ को हुई थी।  

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कभी ना डूबने वाली टाइटैनिक की डूबती हुई कहानी...

      
कभी ना डूबने वाली जहाज टाइटैनिक को आखिर उस रात क्या हुआ कि यह जहाज पूरी तरह से समुद्र में समा गई। टाइटैनिक इस पूरे विश्व का सबसे बड़ा जहाज था इसकी बनावट भी विशेष प्रकार की थी इस कारण कहा जाता था कि यह जहाज कभी नहीं डूबेगी परंतु अपने पहले ही सफर में यह जहाज टाइटैनिक पूरी तरह से समुद्र में कुछ इस प्रकार से डूब गई थी इसका मलबा भी 73 सालों बाद प्राप्त हुआ और इसमें सवार कुल 2224 यात्रियों सहित क्रू मेंबर में से 1500 से भी अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। आइए दोस्तों जानते हैं इस ऐतिहासिक जहाज के बारे में विस्तार से और उसके डूब जाने की पूरी सच्चाई।

         एक विशाल और सुंदर जहाज बनाने के उद्देश्य से व्हाइट स्टार लाइन ने एक प्रोजेक्ट शुरू किया जिसका नाम टाइटैनिक रखा गया था। टाइटैनिक का निर्माण कार्य 31 मार्च 1909 को प्रारंभ हुआ और 26 माह बाद इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था। इस जहाज को बनाने में 15000 से भी अधिक मजदूर लगे थे टाइटैनिक जहाज 3 फुटबॉल मैदान जितना बड़ा था। यह जहाज 882 फीट लंबा और 175 फीट ऊंचा था। यह जहाज 44 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ने की क्षमता रखता था। यह जहाज 16 अलग.अलग खंडो में विभाजित था जो की पूरी तरह से जल रोधी थे अर्थात इसकी बनावट इस प्रकार थी कि एक खंड से पानी दूसरे खंड में नहीं जा सकता था। अगर किसी कारण से इस जहाज के चार खंडों में पानी भर भी जाए तो भी यह जहाज कभी नही डूबेगी। इसकी इसी बनावट के कारण इसको कभी ना डूबने वाला जहाज कहा जाता था।





        टाइटैनिक का पहला और अंतिम सफर : 

       आखिर 10 अप्रैल 1912 को वह समय आ ही गया जब टाइटैनिक को अपनी पहली यात्रा के लिए रवाना किया जाना था। टाइटैनिक की यात्रा शुरू होने के ठीक पहले व्हाइट स्टार लाइन ने टाइटैनिक के एक ऑफिसर डेविड ब्लेयर को दूसरे जहाज में शिफ्ट कर दिया गया परंतु उस समय डेविड ब्लेयर उस लॉकर की चाबी देना भूल गए जिसमें दूरबीन ;दूरदर्शीद्ध रखी हुई थी। इंग्लैंड के साउथैम्प्टन से 920 यात्रियों को लेकर टाइटैनिक न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुई। फ्रांस के चेयरबर्ग से 274 यात्री लेकर टाइटेनिक 11 अप्रैल को आयरलैंड पहुंचा। आयरलैंड के क्वींसटाउन से 123 यात्रियों को लेकर टाइटेनिक न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुई। अब टाइटैनिक में कुल 2224 यात्री और अन्य कर्मचारी थे।

         सुबह 9:00 बजे और दोपहर 1:00 बजे टाइटेनिक को रेडियो द्वारा 2 बार चेतावनी मिली की वह विशाल बर्फ के टुकड़ों में से होकर गुजर रहे हैं। जहाज के कैप्टन ने जब यह चेतावनी व्हाइट स्टार लाइन के चेयरमैन को बताया जो कि उस समय जहाज में मौजूद थे उस समय चेयरमैन ने जहाज की रफ्तार कम करने से मना कर दिया क्योंकि टाइटेनिक पहले ही निश्चित समय से पीछे चल रही थी। कैप्टन ने टाइटैनिक को दक्षिण से ले जाने को कहा 1:45 पर पुनः टाइटेनिक को जर्मन जहाज SS AMERICA, जो उस वक्त उसी रूट पर थी के द्वारा संदेश दिया गया कि वह जिस तरफ से गुजर रहे हैं वहां दो बड़े विशाल हिमपर्वत ;पानी पर तैरते हुए बर्फ के चट्टानद्ध  है परंतु यह संदेश टाइटेनिक तक कभी पहुंचा ही नही। रात लगभग 10:30 पर टाइटेनिक को कैलिफ़ोर्निया जहाज द्वारा पुनः चेतावनी मिली परंतु टाइटेनिक के रेडियों ऑपरेटर ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। जहाज के लॉकर में दूरबीन था मगर लॉकर की चाबी नहीं होने के कारण कैप्टन ने 2 कर्मचारियों को जहाज के आगे तैनात किया था कि किसी खतरे के बारे में जानकारी दे सके। कुछ समय पश्चात जहाज में तैनात कर्मचारी को अंधेरे से भी काली परछाई दिखाई दी जो रात में तारों की रोशनी को भी रोक रही थी इसको देखते ही वह कर्मचारी समझ गया कि यह विशाल हिमपर्वत है। उन्होंने कैप्टन को तुरंत इसकी सूचना दी परंतु पर्याप्त समय नहीं होने के कारण जहाज को मोड़ना मुश्किल था। कैप्टन ने जहाज को हिम पर्वत से दूर ले जाने की पूरी कोशिश की परंतु फिर भी जहाज 100 फीट ऊंचे हिमपर्वत से साइड से टकराते हुए निकली इस वजह से जहाज के 16 खंडों में से पांच खंडों को भारी नुकसान हुआ और उसमें पानी भर गया।  तभी टाइटेनिक को बनाने वाले इंजीनियर में से एक ने बताया कि अब यह जहाज 2 घंटो से ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा। तब यात्रियों को सुरक्षित बचाने के लिए लाइट बोट का इस्तेमाल किया गया। उस समय जहाज में सिर्फ 20 लाइटबोट ही थी। सुबह 12:25 को पहली लाइट बोट सिर्फ 28 यात्रियों को लेकर निकल गई लेकिन उस लाइट बोट में कुल 65 यात्रियों को ले जाने की क्षमता थी। इस प्रकार सभी लाइट बोट में कुल 706 यात्री ही सुरक्षित बचाये जा सके।

         टाइटैनिक के आगे की पांच खंडों में पानी भर जाने के कारण इस जहाज के आगे का पूरा हिस्सा पानी में डूबता जा रहा था और पीछे का हिस्सा दबाव के कारण हवा में ऊपर उठता गया। जिसकी वजह से यह जहाज 15 अप्रैल को सुबह 2रू20 को बीच से दो हिस्सों में अलग.अलग हो गया और कभी ना डूबने वाला यह जहाज कुछ इस तरह से समुद्र में डूब गया कि इसका मलबा भी 73 सालों बाद प्राप्त हुआ। आज भी इस जहाज के दोनों टुकड़े समुद्र के तल पर एक दूसरे से 600 फीट की दूरी पर पड़े हैं।

         इस घटना में 1500 से भी अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। आधे से ज्यादा लोग डूबने से नहीं बल्कि ठंड की वजह से मर गए क्योंकि उस समय समुद्र की पानी का तापमान माइनस 2 डिग्री सेल्सियस था।

       कभी ना डूबने वाली यह जहाज टाइटैनिक महज़ 2 घंटे 40 मिनट में पूरी तरह से समुद्र में समा गई। इतिहास बनाने वाली यह जहाज सिर्फ एक ही रात में इतिहास बनकर रह गई। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करिये और ऐसे ही चटपटी रहस्यमयी आर्टिकल पढ़ने के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए....
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प्रसिद्ध पिरामिड के हैरान कर देने वाले अनसुलझे रहस्य......


दोस्तों पिछले आर्टिकल्स में हम आपको विभिन्न प्रकार के रहस्यो के बारे में जानकारी दे चुके हैं परंतु दोस्तों आज हम आपके लिए लेकर आए हैं एक ऐसा रहस्य जिसको जानकर आप भी हैरान हो जाओगे और सोचने को मजबूर हो जाओगे। दोस्तों आज हम आपको बताएंगे इस दुनिया के सबसे बड़े रहस्य के बारे में जो कि अपने आप में ही एक अद्भुत और रोचक रहस्यमयी पर्यटन स्थल है।

दोस्तों हम जिस रहस्यमयी जगह के बारे में बात कर रहे हैं वह है मिस्र का पिरामिड। यह पिरामिड देखने में बहुत ही सुंदर और प्राचीन स्मारक है। परंतु दोस्तों जितनी खूबसूरत यह जगह है उससे कहीं ज्यादा रहस्यमयी भी है। सुंदर सी दिखने वाली इस पिरामिड के अंदर और बाहर अनेकों रहस्य है जिसमें से कुछ रहस्य खुल चुके हैं और कुछ रहस्य अभी भी रहस्य बना हुआ है। आइये दोस्तों जानते हैं इन रहस्यों के बारे में विस्तार से।




‌दोस्तों मिस्र में कुल 138 पिरामिड है परंतु इनमें ग्रेट गिज़ा पिरामिड सबसे प्रसिद्ध है जो कि गिज़ा में है। ग्रेट गिज़ा पिरामिड को बनाने में मिस्र वासियों को उस समय 23 साल लगे थे। ग्रेट गिज़ा पिरामिड की ऊंचाई 450 फीट है। 43 शताब्दियों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची संरचना थी परंतु 19वीं सदी में यह रिकॉर्ड टूट गया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इतनी बड़ी पिरामिड को बनाया कैसे गया? यह पिरामिड 25 लाख चुना पत्थरो से बनाया गया था और प्रत्येक पत्थरों का वजन 2 टन से 30 टन तक था। अब सवाल यह बनता है कि उस समय के मजदूर इतने वजनी पत्थरों को कैसे उठाते थे और एकदम परफेक्ट पिरामिड स्ट्रक्चर कैसे बना पाए? दोस्तों 4 हजार साल पहले इतनी वजनी पत्थरों से वह भी बिना किसी तकनीक के इतनी परफेक्शन के साथ पिरामिड बनाना लगभग असंभव था। दोस्तों में ऐसा इसलिए कह रहा क्योंकि आज के इंजीनियर्स का मानना है कि आज तकनीकी ज्ञान में इतना विकसित होने के बाद भी इस पिरामिड जैसा दूसरा पिरामिड बनाना असंभव है।
माना जाता है कि पिरामिड इसलिए बनाया जाता था ताकि राजा महाराजाओं के शवों को ममी के रूप में सुरक्षित रखा जा सके। परंतु दोस्तों हैरान कर देने वाली बात यह है कि अभी तक पिरामिड में एक भी ममी (शव) नहीं मिली है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पिरामिड के अंदर और भी कई गुफाएं एवं कमरे हो सकते हैं जिसके बारे में हमें कोई भी जानकारी नहीं है। हालांकि पिरामिड को अभी तक पूरी तरह से एक्सप्लोर नहीं किया गया है। मिस्र के इस गिजा पिरामिड के निर्माण में खगोलीय आधार भी पाए जाते हैं। इस पिरामिड समूह के तीनों पिरामिड ओरियन राशि के 3 तारों के बिल्कुल सीध में है। एक और रहस्य यह है दोस्तों अगर पूरी दुनिया के नक्शे को लेकर उसमें केंद्र का पता लगाया जाए तो उसका भौगोलिक केंद्र बिंदु ग्रेट गिजा़ पिरामिड प्राप्त होता है अर्थात् यह पिरामिड पूरी दुनिया के केंद्र पर स्थित है। अब यह एक संयोग भी हो सकता है और एक रहस्य भी कि आखिर बिल्कुल केंद्र में ही यह पिरामिड कैसे बनाया गया है।

ग्रेट गिज़ा पिरामिड में पत्थरों का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया गया है कि इस पिरामिड का ताप हमेशा 20 डिग्री सेल्सियस रहता है जो कि इस पृथ्वी का औसत तापमान है। पिरामिड के बाहर तापमान कितना भी रहे परंतु अंदर का तापमान हमेशा 20 डिग्री सेल्सियस ही रहता है।
पिरामिड के आधार के चारों कोनो के पत्थरों को बाल और साकेट तकनीक से बनाया गया है ताकि ऊष्मीय प्रसार एवं भूकंप से भी यह पिरामिड सुरक्षित रहे। सोचिए दोस्तों 4 हजार साल पहले भूकंप रोधी स्मारक ? अब 4 हजार साल पहले मिस्र के श्रमिको को इतना ज्ञान कहां से आया यह भी एक रहस्य है। जरा सोचिए दोस्तों 4000 साल पहले वह भी बिना किसी टेक्नालॉजी के यह पिरामिड कैसे बनाया गया होगा जिसे आज की एडवांस टेक्नोलॉजी होने के बाद भी नहीं बनाया जा सकता। इस पिरामिड के अंदर अभी भी बहुत कुछ छानबीन करना बाकी है जिससे संभवतः और भी अनेकों रहस्य खुल सकते हैं।


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3:03 PM
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सूख गया 24000 साल पुराना अराल सागर...


    अराल सागर कजाखस्तान और उज्बेकिस्तानकी सीमाओं में स्थित है। अराल सागर दुनिया का चैाथा सबसे बड़ा झील माना जाता था इसी कारण इस झील को सागर भी कहा जाता है। सन् 1960 में अराल सागर का क्षेत्रफल 68000 वर्ग किण्मीण् था परन्तु वर्तमान में इस संपूर्ण क्षेत्रफल का सिर्फ 10 फीसदी ही शेष बचा है। 1960 में अराल सागर की अधिकतम गहराई 102 मीटर थी परन्तु अब सिर्फ 42 मीटर ही शेष रह गई है। परिणामस्वरूप अराल सागर का पूर्वी भाग रेगिस्तान में बदल गया। प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से यह खूबसूरत सागर रेगिस्तान में बदल गया तो आइये दोस्तो जानते है अराल सागर के सूख जाने का कुछ प्रमुख कारण।

       अराल सागर एक ऐसा सागर जो कुछ दशक पहले पानी से लबालब भरा हुआ था परन्तु अचानक ऐसा क्या हो गया कि इस सागर का 90 फीसदी भाग सूख गया और वर्तमान में सिर्फ 10 फीसदी भाग में ही पानी भरा हुआ हैघ् वर्तमान में इस सागर का 90 फीसदी भाग रेगिस्तान बन चुका है। कुछ दशक पहले यह पूरी जगह चारो ओर से पानी से घिरा हुआ था परन्तु अब इस जगह पर चारो ओर रेत ही रेत और नमक के टीले दिखाई देते है। आखिर ऐसी कौन सी वजह है जिसके कारण इस सागर का 90 फीसदी भाग सूख गया। आइये दोस्तो जानते है इस अराल सागर के बारे में विस्तार से।

      आमू नदी और सीर नदी अराल सागर में विसर्जित होने वाली दो प्रमुख नदियाॅ थी। इन दोनो नदियों एवं वर्षा  जल के कारण अराल सागर में पानी भरा रहता था। परन्तु सन् 1960 के दशक  में सोवियत प्रशासन इन नदियों के पानी का उपयोग मरुद्भूमि में सिंचाई कार्य में करने लगे। मुख्य रुप से यह सिंचाई कार्य कपास आदि के फसलो में किया जाता था। चूॅकि कपास की खेती के लिए सर्वाधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है इस कारण सन् 1980 के आते तक अराल सागर में आमू नदी और सीर नदी का पानी बहुत कम मात्रा में विसर्जित होने लगा जिसकी वजह से अराल सागर में पानी की मात्रा में कमी होने लगी। इस वजह से यह झील सिकुड़ता जा रहा है। इस कारण यह झील अपने मूल आकार का सिर्फ 10 फीसदी ही शेष रह गया है।


     अराल सागर के उत्तरी भाग को बचाएं रखने के लिए कजाखस्तान ने सन् 2005 में बांध परियोजना पूरी की जिससे सन् 2008 में झील के पानी का स्तर सन् 2003 की तुलना में 12 मीटर तक बढ़ गया। कजाखस्तान का यह प्रयास कुछ स्तर तक सफल भी रहा परन्तु अराल सागर को अब पहले जैसा नही बनाया जा सकता क्योंकि अब नदियों में भी पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध नही है जिससे इस सागर को पुनः भरा जा सके।

      दोस्तो मनुष्य जाति अपने स्वार्थ पूर्ती के लिए प्रकृति से छेड़छाड़ कर रही है जिसका परिणाम बहुत ही घातक हो सकता है। अराल सागर का सिकुड़ना इसका सटीक उदाहरण है। 1960 के दशक में सोवियत प्रशासन ने पैदावार में बढ़ोतरी के लिए आमू और सीर नदी के पानी का उपयोग मरुद्भूमि में सिंचाई के लिए करने लगे जिसकी वजह से अराल सागर का 90 फीसदी भाग सूख चुका है। दोस्तो अगर हम प्रकृति का संरक्षण नही करेंगे तो एक समय ऐसा आएगा कि प्रकृति हमें संरक्षित नही करेगी और विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाए आ सकती है। दोस्तो अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तो के साथ भी शेयर करिये और हमारे फेसबूक पेज को लाइक करिये ऐसी ही चटपटी आर्टिकल्स के लिए.... 


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