कभी ना डूबने वाली टाइटैनिक की डूबती हुई कहानी...

      
कभी ना डूबने वाली जहाज टाइटैनिक को आखिर उस रात क्या हुआ कि यह जहाज पूरी तरह से समुद्र में समा गई। टाइटैनिक इस पूरे विश्व का सबसे बड़ा जहाज था इसकी बनावट भी विशेष प्रकार की थी इस कारण कहा जाता था कि यह जहाज कभी नहीं डूबेगी परंतु अपने पहले ही सफर में यह जहाज टाइटैनिक पूरी तरह से समुद्र में कुछ इस प्रकार से डूब गई थी इसका मलबा भी 73 सालों बाद प्राप्त हुआ और इसमें सवार कुल 2224 यात्रियों सहित क्रू मेंबर में से 1500 से भी अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। आइए दोस्तों जानते हैं इस ऐतिहासिक जहाज के बारे में विस्तार से और उसके डूब जाने की पूरी सच्चाई।

         एक विशाल और सुंदर जहाज बनाने के उद्देश्य से व्हाइट स्टार लाइन ने एक प्रोजेक्ट शुरू किया जिसका नाम टाइटैनिक रखा गया था। टाइटैनिक का निर्माण कार्य 31 मार्च 1909 को प्रारंभ हुआ और 26 माह बाद इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था। इस जहाज को बनाने में 15000 से भी अधिक मजदूर लगे थे टाइटैनिक जहाज 3 फुटबॉल मैदान जितना बड़ा था। यह जहाज 882 फीट लंबा और 175 फीट ऊंचा था। यह जहाज 44 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ने की क्षमता रखता था। यह जहाज 16 अलग.अलग खंडो में विभाजित था जो की पूरी तरह से जल रोधी थे अर्थात इसकी बनावट इस प्रकार थी कि एक खंड से पानी दूसरे खंड में नहीं जा सकता था। अगर किसी कारण से इस जहाज के चार खंडों में पानी भर भी जाए तो भी यह जहाज कभी नही डूबेगी। इसकी इसी बनावट के कारण इसको कभी ना डूबने वाला जहाज कहा जाता था।





        टाइटैनिक का पहला और अंतिम सफर : 

       आखिर 10 अप्रैल 1912 को वह समय आ ही गया जब टाइटैनिक को अपनी पहली यात्रा के लिए रवाना किया जाना था। टाइटैनिक की यात्रा शुरू होने के ठीक पहले व्हाइट स्टार लाइन ने टाइटैनिक के एक ऑफिसर डेविड ब्लेयर को दूसरे जहाज में शिफ्ट कर दिया गया परंतु उस समय डेविड ब्लेयर उस लॉकर की चाबी देना भूल गए जिसमें दूरबीन ;दूरदर्शीद्ध रखी हुई थी। इंग्लैंड के साउथैम्प्टन से 920 यात्रियों को लेकर टाइटैनिक न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुई। फ्रांस के चेयरबर्ग से 274 यात्री लेकर टाइटेनिक 11 अप्रैल को आयरलैंड पहुंचा। आयरलैंड के क्वींसटाउन से 123 यात्रियों को लेकर टाइटेनिक न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुई। अब टाइटैनिक में कुल 2224 यात्री और अन्य कर्मचारी थे।

         सुबह 9:00 बजे और दोपहर 1:00 बजे टाइटेनिक को रेडियो द्वारा 2 बार चेतावनी मिली की वह विशाल बर्फ के टुकड़ों में से होकर गुजर रहे हैं। जहाज के कैप्टन ने जब यह चेतावनी व्हाइट स्टार लाइन के चेयरमैन को बताया जो कि उस समय जहाज में मौजूद थे उस समय चेयरमैन ने जहाज की रफ्तार कम करने से मना कर दिया क्योंकि टाइटेनिक पहले ही निश्चित समय से पीछे चल रही थी। कैप्टन ने टाइटैनिक को दक्षिण से ले जाने को कहा 1:45 पर पुनः टाइटेनिक को जर्मन जहाज SS AMERICA, जो उस वक्त उसी रूट पर थी के द्वारा संदेश दिया गया कि वह जिस तरफ से गुजर रहे हैं वहां दो बड़े विशाल हिमपर्वत ;पानी पर तैरते हुए बर्फ के चट्टानद्ध  है परंतु यह संदेश टाइटेनिक तक कभी पहुंचा ही नही। रात लगभग 10:30 पर टाइटेनिक को कैलिफ़ोर्निया जहाज द्वारा पुनः चेतावनी मिली परंतु टाइटेनिक के रेडियों ऑपरेटर ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। जहाज के लॉकर में दूरबीन था मगर लॉकर की चाबी नहीं होने के कारण कैप्टन ने 2 कर्मचारियों को जहाज के आगे तैनात किया था कि किसी खतरे के बारे में जानकारी दे सके। कुछ समय पश्चात जहाज में तैनात कर्मचारी को अंधेरे से भी काली परछाई दिखाई दी जो रात में तारों की रोशनी को भी रोक रही थी इसको देखते ही वह कर्मचारी समझ गया कि यह विशाल हिमपर्वत है। उन्होंने कैप्टन को तुरंत इसकी सूचना दी परंतु पर्याप्त समय नहीं होने के कारण जहाज को मोड़ना मुश्किल था। कैप्टन ने जहाज को हिम पर्वत से दूर ले जाने की पूरी कोशिश की परंतु फिर भी जहाज 100 फीट ऊंचे हिमपर्वत से साइड से टकराते हुए निकली इस वजह से जहाज के 16 खंडों में से पांच खंडों को भारी नुकसान हुआ और उसमें पानी भर गया।  तभी टाइटेनिक को बनाने वाले इंजीनियर में से एक ने बताया कि अब यह जहाज 2 घंटो से ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा। तब यात्रियों को सुरक्षित बचाने के लिए लाइट बोट का इस्तेमाल किया गया। उस समय जहाज में सिर्फ 20 लाइटबोट ही थी। सुबह 12:25 को पहली लाइट बोट सिर्फ 28 यात्रियों को लेकर निकल गई लेकिन उस लाइट बोट में कुल 65 यात्रियों को ले जाने की क्षमता थी। इस प्रकार सभी लाइट बोट में कुल 706 यात्री ही सुरक्षित बचाये जा सके।

         टाइटैनिक के आगे की पांच खंडों में पानी भर जाने के कारण इस जहाज के आगे का पूरा हिस्सा पानी में डूबता जा रहा था और पीछे का हिस्सा दबाव के कारण हवा में ऊपर उठता गया। जिसकी वजह से यह जहाज 15 अप्रैल को सुबह 2रू20 को बीच से दो हिस्सों में अलग.अलग हो गया और कभी ना डूबने वाला यह जहाज कुछ इस तरह से समुद्र में डूब गया कि इसका मलबा भी 73 सालों बाद प्राप्त हुआ। आज भी इस जहाज के दोनों टुकड़े समुद्र के तल पर एक दूसरे से 600 फीट की दूरी पर पड़े हैं।

         इस घटना में 1500 से भी अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। आधे से ज्यादा लोग डूबने से नहीं बल्कि ठंड की वजह से मर गए क्योंकि उस समय समुद्र की पानी का तापमान माइनस 2 डिग्री सेल्सियस था।

       कभी ना डूबने वाली यह जहाज टाइटैनिक महज़ 2 घंटे 40 मिनट में पूरी तरह से समुद्र में समा गई। इतिहास बनाने वाली यह जहाज सिर्फ एक ही रात में इतिहास बनकर रह गई। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करिये और ऐसे ही चटपटी रहस्यमयी आर्टिकल पढ़ने के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए....
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2 comments:

  1. भाई बहुत अच्छा जानकारी देते हो आप बहुत बढ़िया

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