• जानिये फांसी देने के पूर्व कैदी के कान में जल्लाद क्या कहता है... ईनाम...

    नमस्कार दोस्तो आज हम आपको ले जायेंगे एक ऐसे रहस्य की ओर जिसको आप भी जानना चाहेंगे, दोंस्तो अक्सर आपने फिल्मो मे देखा होगा या कहीं से सुना होगा की किसी अपराधी को फंासी पर चढाने के पूर्व जल्लाद कैदी के कानो मे कुछ कहता है। तो दोस्तो आज हम आपको इस रहस्य से वाकिफ कराना चाहेंगे । नको ईनाम भी दिया जाता है।

  • माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स

    दोस्तो आज हम बात करेंगे माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स के बारे में। दोस्तो माउण्ट एवरेस्ट फतह करने वाली दुनिया की पहली ट्विन्स लडकियाॅ थी।

  • जानिए दुनिया में जन्म लेने वाला पहेला इंसान कौन था...

    नमस्कार दोस्तो, हर कोई जानना चाहता है की दुनिया में जन्म लेने वाला पहेला इंसान तो आइये आज हम जानते है हमारे अस्तित्व के बारे मे, आइये जानते है हमारे इतिहास को । इसके अलावा आज हम आपको बतायेंगे उस महिला के बारे मे जिसने दुनिया पर पहली बार बच्चा पैदा किया।

जमीन को हम कितनी गहराई तक खोद सकते है..?

    जैसा कि दोस्तों हम सभी जानते हैं यह पृथ्वी गोल है। इस हिसाब से एक प्रश्न यह उठता है कि अगर हम भारत के किसी एक भाग पर खुदाई करे तो क्या हम किसी दूसरे भू-भाग पर या देश अमेरिका तक पहुंच सकते हैं। जैसा कि हम जानते हैं भारत के ठीक पीछे अमेरिका आता है तो क्या हम भारत से सुरंग बनाकर अमेरिका जा सकते है क्या..? दोस्तों यह सवाल थोड़ा अजीब है परंतु इस सवाल में दम तो है, तो आइये अब जानते है की जमीन को हम कितनी गहराई तक खोद सकते है..?



      बचपन में हमने पढ़ा था कि यह धरती अलग-अलग परतों से बनी हुई है परंतु हैरान कर देने वाली बात यह है कि वैज्ञानिक भी आज तक यह पता नहीं लगा पाए कि आखिर इन परतों के नीचे क्या है? वैज्ञानिकों का सिर्फ अनुमान है कि इन परतों के नीचे खनिज या कुछ ऐसी जरूरी पदार्थ हो सकते हैं जो कि किमती और हमारे लिए उपयोगी है। परंतु यह सिर्फ एक अनुमान है सच क्या है यह किसी को नहीं पता। धरती के अंदर तक जाने के लिए विभिन्न देशों ने बहुत प्रयास किए परंतु हर बार असफलता ही हाथ लगी। दोस्तों आज हम आपको बताएंगे एक ऐसी जगह के बारे में जो कि मनुष्यो द्वारा धरती पर खोदी गई सबसे अधिक गहरी जगह है। इस जगह की गहराई में छुपी है अनेकों रहस्य जो कि आपको निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर देंगे।

     सोवियत यूनियन ने रूस में एक खुदाई की जो कि धरती की सबसे गहरी जगह है जिसमे 167 क़ुतुब मीनार समा जाये अब आपको आश्वर्य यह होगा की फिर कितनी होगी इस जगह की गहराई ? तो अब हम आपको बता दे की वो जगह की गहराई 12 किलोमीटर है। 12 किलोमीटर गहरी इस जगह का नाम "कोला सुपरडीप होल" रखा गया है। यह कोला सुपरडीप होल समुद्र की सबसे अधिकतम गहराई से भी ज्यादा गहरा है। 12 किलोमीटर इस गड्ढे में अनेकों रहस्य छुपे हुए हैं जिसमें से कुछ  रहस्यों के बारे में बताया गया है। आइए जानते हैं कुछ विशेष और महत्वपूर्ण रहस्यों के बारे में।

      12 किलोमीटर गहरे इस गड्ढे को जब 7 किलोमीटर तक खोदा गया था तब वैज्ञानिकों को इस जगह पर पाए जाने वाले पत्थरों में जल मिला था। वैज्ञानिकों ने बताया यह जल वहां पर मौजूद ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के कारण मिला है।

      इस गड्ढे की सबसे बड़ी खोज यह थी कि इसमें वैज्ञानिकों को सूक्ष्मजीव भी मिले। इतने गहरे गड्ढे में वो भी इतने अधिक तापमान होने पर भी वहां किसी ने भी जीवन की कल्पना नहीं की थी क्योंकि धरती के अंदर गहराई में जाने पर तापमान लगातार बढ़ता रहता है। खोजकर्ताओं का मानना था कि यह सिर्फ एक ही प्रकार के सूक्ष्म जीव होंगे परंतु बाद की खोजो से पता चला कि एक नहीं बल्कि बहुत प्रकार के सुक्ष्मजीव वहां मौजूद थे जो कि बहुत ज्यादा पुराने पत्थरों में पाए गए थे। धरती के अंदर के ये पत्थर 2 बिलियन वर्ष पुराने हैं और आज भी उसी स्थिति में मौजूद है। खोजकर्ताओं को इस गड्ढे के नीचे हिलियम, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे बहुत सारे गैस भी मिले।

     सन् 1994 में कोला सुपरडीप होल को बंद कर दिया गया। खोजकर्ताओं का कहना था कि इस गड्ढे के सबसे अंतिम छोर में तापमान 180 डिग्री सेल्सियस था और इतने अधिक तापमान में कार्य जारी रखना संभव नहीं था। जैसा कि हम सभी जानते हैं 100 डिग्री सेल्सियस में पानी उबलने लगता है परंतु वहां तो तापमान 180 डिग्री सेल्सियस था इस कारण इस गड्ढे की खुदाई कार्य को बंद करना पड़ा। ऐसा खोजकर्ताओं ने बयान जारी किया था।

     इसके अलावा कुछ लोगों का यह भी मानना था कि उस गड्ढे से इंसानों के चीखने की आवाज आ रही थी इस कारण खोजकर्ता डर गए थे कि कहीं वह नरक तक खुदाई ना कर दे। कुछ खोजो में यह भी दावा किया गया था कि यह चीखे आत्माओं की है जो कि नरक में निवास करती है इस कारण इस गड्ढे को नरक का कुआं भी कहा जाता था। संभवतः यह बात महज़ एक झूठ हो सकती है क्योंकि ऐसा सिर्फ लोगों का अनुमान था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कुछ रहस्यमयी कारणों की वजह से इस गड्ढे को बंद कर दिया गया।

     इस कोला सुपरडीप होल को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है ताकि भविष्य में अगर कोई भी इस प्रोजेक्ट को पुनः चालू करवाना चाहे तो भी ना करा सके। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही रहस्यमयी और मजेदार आर्टिकल्स के लिए........
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कोई व्यक्ति कितने समय तक अकेले रह सकता है...?

अकेलापन एक ऐसा शब्द है जिसे हर कोई अपने जिंदगी में लाना चाहता है। दिनभर की परेशानियों, चिंताओ एवं शोर से भरी वातावरण से दूर हर कोई चाहता है कि उसे कुछ समय तक शांत एवं अकेलेपन का माहौल मिले। अकेलेपन की एक दूसरी वजह यह भी है कि लोग टेक्नोलॉजी में इतना विकसित हो चुके हैं कि लोग आपस में मेल मिलाप से दूर अपना अधिकांश समय कंप्यूटर, मोबाइल में व्यतीत करने लगे हैं। दोस्तों क्या कभी आपने कल्पना किया है कि आखिर कोई व्यक्ति कितने समय तक अकेले रह सकता है? क्या आपने कल्पना किया है कि अधिक समय तक अकेले रहने से किन-किन अजीब परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है? क्या अकेलापन हावी हो जाए तो लोग पागल भी हो सकते हैं? इन सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ प्रयोग किये है जिसका परिणाम नीचे बता रहा हूं जो कि संभवतः आपको हैरान कर देंगे।


  •      माइकल शिफ्रे का प्रयोग :-
     फ्रेंच एक्सप्लोरर माइकल शिफ्रे ने अकेलापन का दुष्परिणाम जानने के लिए खुद पर एक प्रयोग किया। इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य था कि अगर कोई अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में किसी दुर्घटना में फंस गया और उसे अकेले रहने जैसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा तो उसके दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ेगा। 14 फरवरी सन् 1972 को माइकल 6 महीने अर्थात् 180 दिनों के लिए टेक्सास के मिडनाइट नामक गुफा में रहने चले गए। वहां माइकल मोबाइल एवं इंटरनेट से दूर एक नायलाॅन के टेंट में रहते थे। उस समय उसके पास कुछ किताबें, सीडी प्लेयर और फ्रीजर के अलावा कुछ नहीं था। माइकल के भोजन की जिम्मेदारी नासा (NASA) ने ली थी ताकि माइकल के स्वास्थ्य पर नजर रखा जा सके। कुछ दिन अकेले रहने के बाद ही माइकल पर अकेलापन हावी होने लगा और वह कुछ भी अजीब अजीब बातें सोचकर दुःखी हो जाते थे। महज़ 77 दिनों के बाद ही माइकल को छोटी मोटी बातें याद रखने के लिए भी काॅपी-पेन का सहारा लेना पड़ा। 6 महीनों बाद जब माइकल वापस आए तो वह पागल तो नहीं हुआ परंतु वापस आने के तीन-चार सालों तक उसकी स्मरणशक्ति ठीक से काम नहीं करती थी और माइकल को कभी-कभी सदमे का दौरा भी पड़ता था।

  •   एडम ब्लूम का अकेलापन :- 
      बीबीसी ने माइकल शिफ्रे की प्रयोग की तरह ही एक और प्रयोग किया जिसमें 6 चुने हुए लोगों को न्यूक्लियर बंकर में 48 घंटे अकेले गुजारने थे। इन 6 लोगों में एडम ब्लूम नामक एक कॉमेडियन थे जिसने 2-4 घंटो तक गाना गाकर एवं चुटकुले बोलकर जल्दी-जल्दी समय बिताने का प्रयास किया। परंतु 18 घंटे बाद ही ब्लूम को सदमा एवं चिड़चिड़ापन आने लगा। 40 घंटे होते ही ब्लूम पर दृष्टिभ्रम (वहम) हावी होने लगा और उसके दिमाग ने खेल खेलना चालू कर दिया। ब्लूम को भूतियाॅ पैरों की आहट सुनाई देने लगी एवं और भी बहुत सारे वहम होने लगे। ब्लूम ने 48 घंटों का समय पूरा किया और न्यूक्लीयर बंकर से सही सलामत बाहर आ गया।

        इन प्रयोगो से स्पष्ट होता है कि अकेलेपन से लोग पागल तो नहीं हो सकते लेकिन पागलपन के बहुत करीब आ सकते हैं। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही चटपटी, रहस्यमयी एवं मजेदार आर्टिकल्स के लिए..........
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ये ग्रह पृथ्वी से टकराकर कर देगा पृथ्वी को नष्ट...

पिछले कुछ दशकों से मनुष्य तकनीकी ज्ञान में इतना विकसित हो चुका है कि हमें हमारे अंतरिक्ष के बारे में बहुत सारी रहस्यमयी और अदभुत जानकारी प्राप्त है। जिनमें से कुछ जानकारी अभी भी अनसुलझा हुआ रहस्य है। इसी अनसुलझी हुई जानकारी के क्रम में हमें एक ऐसी क्षुद्रग्रह के बारे में जानकारी मिली है जिसके अध्ययन से हमें पृथ्वी की संरचना एवं बनावट के संबंध में बहुत सारी रहस्यमयी जानकारी प्राप्त हो सकती है। यह क्षुद्रग्रह आदिकाल में पृथ्वी का ही एक हिस्सा था जो कि किसी कारणवश पृथ्वी से अलग हो गया था। ये क्षुद्रग्रह आज भी पृथ्वी से बहुत दूर है और अपनी कक्ष में सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि यह क्षुद्रग्रह एक दिन पृथ्वी से टकरा जाएगा और पृथ्वीवासियों को इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ सकता है। आइए दोस्तों जानते हैं इस क्षुद्रग्रह के बारे में विस्तार से और उस दिन का जिस दिन या क्षुद्रग्रह पृथ्वी से टकराएगा।



       11 सितंबर सन् 1999 को "लिंकल्न नियर-अर्थ स्टीरॉयड रिसर्च (LINEAR)" ने एक छुद्रग्रह की खोज की।  23 सितंबर सन् 1999 को "डीप स्पेस नेटवर्क" से राडार इमेजिंग के द्वारा इस क्षुद्रग्रह की तस्वीरें खींची गई। यह धरती के बहुत करीब से गुजरा था। इस क्षुद्रग्रह का नाम बेन्नू 101955 (BENNU 101955) रखा गया था। यह बेनू नामक क्षुद्रग्रह हमें हमारे अस्तित्व के बारे में बताने वाला है क्योंकि यह पहले हमारी धरती का ही एक भाग था। यह कार्बोनेेशियस क्षुद्रग्रह(बेनू) धरती के कक्ष के बहुत नजदीक से ही सूर्य की परिक्रमा करता है।

      18 सितंबर सन् 2016 को OSIRIS-REx प्रक्षेपित किया गया जिसका उद्देश्य था बेनू क्षुद्रग्रह पर लैंड कर उसका सैंपल लेकर वापस धरती पर आना। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार सितंबर 2023 तक OSIRIS-REx वापस धरती पर आ जाएगा। अर्थात यह मिशन 7 वर्षों तक चलेगा। यह मिशन सुनने में जितना आसान लग रहा है वास्तव में उतना आसान नहीं है। इस मिशन की कुल लागत 800 मिलीयन डॉलर है यानी कि 5,55,52,00,00,000 रुपए है।

      ताजा जानकारी के अनुसार 3 सितंबर सन् 2018 को OSIRIS-REx 2 सालों के लंबे समय अंतराल के बाद छुद्र ग्रह बेनू के बहुत नजदीक तक पहुंच चुका है। इस OSIRIS-REx ने बेनू की एक स्पष्ट तस्वीर भी भेजी है। इन तस्वीरों की मदद से हमें पहली बार ऐसा मौका मिला है कि हम किसी छुद्रग्रह को इतने करीब से देख सके हैं।

     वैसे तो सौरमंडल में बहुत सारे क्षुद्रग्रह है परंतु यह बेनू नामक क्षुद्रग्रह हमारे लिए कुछ ज्यादा ही विशेष प्रकार का है। देखने में यह क्षुद्रग्रह लड्डू की तरह गोल घूमती हुई दिखाई देती है। यह क्षुद्रग्रह 4.3 घंटों में अपने अक्ष पर एक परिक्रमा पूर्ण करता है। बेनू की परिक्रमा करने की गति समय के साथ लगातार बढ़ती जा रही है। गणना के अनुसार वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सितंबर सन् 2060 में बेनू धरती से करीब 7 लाख 50 हज़ार किलोमीटर दूर से गुजरेगा और सितंबर सन् 2135 में करीब 3 लाख किलोमीटर की दूरी से धरती से गुजरेगा अर्थात चांद जितनी दूरी से धरती से गुजरेगा। सितंबर सन् 2175 में बेनू धरती से टकरा सकता हैए परंतु इसकी संभावना बहुत ही कम है। इस क्षुद्रग्रह का धरती पर टकराने की संभावना 24 हज़ार में से एक (1/24,000) है। परंतु फिर भी अगर यह बेन्नू धरती से टकरा गया तो पूरे एक शहर को नष्ट करने की क्षमता रखता है। चूंकि बेनू की धरती पर टकराने का समय अभी बहुत दूर है इस कारण वैज्ञानिक अभी सिर्फ बेनू के अध्ययन पर लगा हुआ है जिससे कि हमें निश्चित ही हमारे उत्पत्ति एवं ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संबंध में बहुत सारी रहस्यमयी जानकारी प्राप्त हो सकती है।

       सितंबर सन् 2023 को OSIRIS-REx बेनू पर अपना मिशन पूरा करके वापस धरती पर आएगा अर्थात बेनू की सतह की कुछ सैंपल लेकर वापस धरती पर आएगा। जिसके अध्ययन से हमें निश्चित ही बहुत सारी नयी जानकारी प्राप्त हो सकती है। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसी ही चटपटीए मजेदार और रहस्यमयी आर्टिकल्स के लिए...



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