कोई व्यक्ति कितने समय तक अकेले रह सकता है...?

अकेलापन एक ऐसा शब्द है जिसे हर कोई अपने जिंदगी में लाना चाहता है। दिनभर की परेशानियों, चिंताओ एवं शोर से भरी वातावरण से दूर हर कोई चाहता है कि उसे कुछ समय तक शांत एवं अकेलेपन का माहौल मिले। अकेलेपन की एक दूसरी वजह यह भी है कि लोग टेक्नोलॉजी में इतना विकसित हो चुके हैं कि लोग आपस में मेल मिलाप से दूर अपना अधिकांश समय कंप्यूटर, मोबाइल में व्यतीत करने लगे हैं। दोस्तों क्या कभी आपने कल्पना किया है कि आखिर कोई व्यक्ति कितने समय तक अकेले रह सकता है? क्या आपने कल्पना किया है कि अधिक समय तक अकेले रहने से किन-किन अजीब परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है? क्या अकेलापन हावी हो जाए तो लोग पागल भी हो सकते हैं? इन सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ प्रयोग किये है जिसका परिणाम नीचे बता रहा हूं जो कि संभवतः आपको हैरान कर देंगे।


  •      माइकल शिफ्रे का प्रयोग :-
     फ्रेंच एक्सप्लोरर माइकल शिफ्रे ने अकेलापन का दुष्परिणाम जानने के लिए खुद पर एक प्रयोग किया। इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य था कि अगर कोई अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में किसी दुर्घटना में फंस गया और उसे अकेले रहने जैसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा तो उसके दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ेगा। 14 फरवरी सन् 1972 को माइकल 6 महीने अर्थात् 180 दिनों के लिए टेक्सास के मिडनाइट नामक गुफा में रहने चले गए। वहां माइकल मोबाइल एवं इंटरनेट से दूर एक नायलाॅन के टेंट में रहते थे। उस समय उसके पास कुछ किताबें, सीडी प्लेयर और फ्रीजर के अलावा कुछ नहीं था। माइकल के भोजन की जिम्मेदारी नासा (NASA) ने ली थी ताकि माइकल के स्वास्थ्य पर नजर रखा जा सके। कुछ दिन अकेले रहने के बाद ही माइकल पर अकेलापन हावी होने लगा और वह कुछ भी अजीब अजीब बातें सोचकर दुःखी हो जाते थे। महज़ 77 दिनों के बाद ही माइकल को छोटी मोटी बातें याद रखने के लिए भी काॅपी-पेन का सहारा लेना पड़ा। 6 महीनों बाद जब माइकल वापस आए तो वह पागल तो नहीं हुआ परंतु वापस आने के तीन-चार सालों तक उसकी स्मरणशक्ति ठीक से काम नहीं करती थी और माइकल को कभी-कभी सदमे का दौरा भी पड़ता था।

  •   एडम ब्लूम का अकेलापन :- 
      बीबीसी ने माइकल शिफ्रे की प्रयोग की तरह ही एक और प्रयोग किया जिसमें 6 चुने हुए लोगों को न्यूक्लियर बंकर में 48 घंटे अकेले गुजारने थे। इन 6 लोगों में एडम ब्लूम नामक एक कॉमेडियन थे जिसने 2-4 घंटो तक गाना गाकर एवं चुटकुले बोलकर जल्दी-जल्दी समय बिताने का प्रयास किया। परंतु 18 घंटे बाद ही ब्लूम को सदमा एवं चिड़चिड़ापन आने लगा। 40 घंटे होते ही ब्लूम पर दृष्टिभ्रम (वहम) हावी होने लगा और उसके दिमाग ने खेल खेलना चालू कर दिया। ब्लूम को भूतियाॅ पैरों की आहट सुनाई देने लगी एवं और भी बहुत सारे वहम होने लगे। ब्लूम ने 48 घंटों का समय पूरा किया और न्यूक्लीयर बंकर से सही सलामत बाहर आ गया।

        इन प्रयोगो से स्पष्ट होता है कि अकेलेपन से लोग पागल तो नहीं हो सकते लेकिन पागलपन के बहुत करीब आ सकते हैं। दोस्तों अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कीजिए और हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए ऐसे ही चटपटी, रहस्यमयी एवं मजेदार आर्टिकल्स के लिए..........
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5 comments:

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  2. हव सर तेकरे सती में ह 12 घण्टा मे से 10 घण्टा मोबाइल म लगे रथो👻

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  3. काबर की मोला पागल नई होना हे🙏

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